
हर मोड़ की कहानी
नागौर
नागौर का इतिहास असाधारण रूप से समृद्ध है। महाभारत काल में यह इलाका 'जांगलदेश' कहलाता था और अहिछत्रपुर, यानी आज का नागौर, उसकी राजधानी था। यह धरती एक साथ तीन रंगों में रंगी है — राजपूतों की तलवार का शौर्य, सूफी संतों की आस्था और भक्तिकाल के प्रेम की मिठास। किले, छतरियाँ, दरगाहें और मंदिर यहाँ हर कदम पर कोई न कोई कहानी सुनाते हैं।
कहानियाँ
5 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
नागौर किला (अहिछत्रगढ़ दुर्ग)
इतिहास और किंवदंतीनागौर का किला उन गिने-चुने भारतीय दुर्गों में से है जो पहाड़ी पर नहीं, बिल्कुल समतल ज़मीन पर खड़ा है। दस्तावेज़ नहीं, बस मान्यता कहती है कि लगभग चौथी शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने इसकी पहली मिट्टी की नींव रखी, और बारहवीं सदी में पृथ्वीराज चौहान के सामंत कैमास ने इसे ईंट और पत्थर से नए सिरे से गढ़ा। सबसे अनोखी बात इन्हीं दीवारों को लेकर कही जाती है — कहा जाता है कि दुश्मन की तोपों के गोले दीवारों को छुए बिना ऊपर से निकल जाते थे। मुगल, राठौड़ और चौहान — यहाँ कई लड़ाइयाँ लड़ी गईं, और किला हर एक का गवाह रहा।
अमर सिंह राठौड़ की छतरी
इतिहास और किंवदंतीअमर सिंह राठौड़ की छतरी पीले, लाल और भूरे बलुआ पत्थर से बनी है, सोलह खंभों पर टिकी, नागौर में — जिस इलाके को अमर सिंह कॉलोनी कहा जाता है। राव अमर सिंह मारवाड़ के उन योद्धाओं में थे जिनका स्वाभिमान जान से बड़ा था; शाहजहाँ ने उन्हें नागौर सौंपा था। कहा जाता है कि बादशाह के एक बड़े अमीर सलाबत खान ने भरे दरबार में उन्हें 'गँवार' कहकर अपमानित किया, और अमर सिंह ने वहीं कटार चला दी। फिर, किंवदंती है कि अपने घोड़े 'बादल' पर सवार होकर वे आगरा किले की ऊँची दीवार से कूद गए। पास ही उनकी रानियों के स्मारक हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे सती हुईं।
मीराबाई मंदिर (मेड़ता सिटी)
इतिहास और किंवदंतीमेड़ता सिटी का यह मंदिर वास्तुकला का सुंदर नमूना है — शैली को आम तौर पर राजपूताना बताया जाता है — और नागौर ज़िले के सबसे पवित्र ठिकानों में गिना जाता है। अधिकांश वृत्तांतों के अनुसार मीराबाई का जन्म कुड़की गाँव में हुआ, हालाँकि कुछ स्रोत उनका जन्मस्थान मेड़ता ही बताते हैं। परंपरा कहती है कि उनका बचपन मेड़ता के इसी महल और मंदिर परिसर में बीता, यहीं उन्होंने कृष्ण को अपना सब कुछ मान लिया और यहीं वे भजन रचे जो आसपास के हर राज्य से अधिक जीवित रहे। लोक मान्यता है कि उनकी पूरी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत इसी धरती से हुई, और आज भी श्रद्धालु उनके पद गाते हुए यहाँ पहुँचते हैं।
सूफी संत तारकीन की दरगाह
इतिहासनागौर किले की दीवारों के पास बनी यह दरगाह ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी की स्मृति में है, जिन्हें ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के सबसे भरोसेमंद शिष्यों में गिना जाता है। मुस्लिम समुदाय में इसे अजमेर शरीफ के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। इसका विशाल प्रवेश द्वार, 'तारकीन का दरवाजा', परंपरा के अनुसार सुल्तान इल्तुतमिश का बनवाया हुआ कहा जाता है, हालाँकि इस बारे में स्रोत एकमत नहीं हैं। सदियों से यहाँ हिंदू और मुसलमान साथ सिर झुकाते आए हैं — यह जगह आपसी भाईचारे की जीती-जागती मिसाल है।
खींवसर किला
इतिहासथार मरुस्थल के छोर पर खड़ा खींवसर का किला आज एक मशहूर हेरिटेज होटल है, पर इसकी शुरुआत बहुत सख़्त थी। सोलहवीं शताब्दी में, लगभग 1523 ईस्वी में, जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के पुत्र राव करमसीजी ने — जिन्हें उनका आठवाँ बेटा माना जाता है — इसे बनवाया, और कहा जाता है कि यह सिर्फ़ एक सैनिक चौकी थी, दुश्मन पर नज़र रखने के लिए। परंपरा के अनुसार अठारहवीं सदी में शाही परिवार यहाँ रहने आया और किले के भीतर सुंदर महल बने। एक हिस्सा आज भी उसी परिवार के वंशजों के पास है, और पास के रेतीले धोरे मरुस्थली जीवन की झलक दिखाते हैं।
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