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हर मोड़ की कहानी

हनुमानगढ़

राजस्थान के उत्तरी छोर पर बसा हनुमानगढ़ प्राचीन काल में 'भटनेर' कहलाता था। इसके आज के नाम के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है—सन 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने भाटी शासकों को हराकर यहाँ का किला जीत लिया। वह जीत मंगलवार के दिन मिली, जो हनुमान जी का पवित्र दिन माना जाता है, इसीलिए राजा ने शहर का नाम बदलकर हनुमानगढ़ रख दिया।

कहानियाँ

7 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. भटनेर का किला

    इतिहास और किंवदंती

    घग्घर नदी के किनारे खड़ा भटनेर का किला भारत के सबसे पुराने दुर्गों में गिना जाता है। परंपरा इसे तीसरी शताब्दी तक ले जाती है—हालाँकि सन् को लेकर स्रोत एकमत नहीं हैं। कहा जाता है कि भाटी वंश के राजकुमार भूपत एक युद्ध हारने के बाद इस जंगल वाले इलाके में आ शरण ली और पकी ईंटों का यह विशाल गढ़ खड़ा करवाया। दिल्ली–मुल्तान के पुराने रास्ते पर होने के कारण कहा जाता है कि इसने आसपास के लगभग हर किले से ज़्यादा हमले झेले—महमूद गजनवी इसकी दीवारों से टकराया, 1398 में तैमूर ने इसे जीता, और अकबर के समय इस पर घेरा नहीं पड़ा, बल्कि आईन-ए-अकबरी में इसका उल्लेख मिलता है। तैमूर की स्मृतियों में इसे हिंदुस्तान के सबसे मज़बूत किलों में गिना बताया जाता है।

  2. कालीबंगा पुरातात्विक स्थल

    इतिहास

    कालीबंगा किसी जीवित टाइम कैप्सूल जैसा है। नाम का अर्थ ही है 'काले रंग की चूड़ियाँ'—इन टीलों पर बिखरे काली चूड़ियों के टुकड़ों से ही इस जगह को यह नाम मिला, और खुदाई में यहाँ सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों की परत दर परत निकलती चली गई। दुनिया में उत्खनन से मिला सबसे पुराना जुता हुआ खेत यहीं है, और उसके आसपास हड़प्पाकालीन नगर-योजना, बर्तन, बच्चों के खिलौने और अग्नि-वेदिकाएँ। पास ही बना संग्रहालय पाँच हज़ार साल पुरानी उस भरी-पूरी ज़िंदगी की झलक आज भी दिखा देता है।

  3. श्री गोगाजी मंदिर / गोगामेड़ी

    इतिहास और किंवदंती

    हनुमानगढ़ से करीब 120 किलोमीटर दूर गोगामेड़ी में लोक देवता गोगाजी की समाधि है, जिन्हें भक्त जाहरवीर कहते हैं। लोककथाएँ बताती हैं कि चौहान वंश के इस वीर योद्धा को गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद मिला था और उन्होंने गायों की रक्षा के लिए आक्रांताओं से भीषण युद्ध लड़ा। उन्हें साँपों का देवता माना जाता है; कहते हैं उनके नाम का धागा बाँध लेने पर सर्पदंश का ज़हर नहीं चढ़ता। यहाँ की सबसे सुंदर बात यह है कि समाधि पर एक हिंदू पुजारी और एक मुस्लिम पुजारी साथ-साथ सेवा करते हैं—मुस्लिम समुदाय इन्हें जाहर पीर कहकर पूजता है। भादो में यहाँ विशाल मेला भरता है।

  4. माता भद्रकाली मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    घग्घर के किनारे अमरपुरा गाँव के पास बना यह प्राचीन मंदिर देवी दुर्गा के भद्रकाली स्वरूप को समर्पित है। कहा जाता है कि बीकानेर के छठे शासक राजा रायसिंह ने यह मंदिर बनवाया था, और लाल पत्थर की जो सुंदर प्रतिमा आज भी श्रद्धालुओं को खींचती है, वह उन्हीं के समय की मानी जाती है। आसपास के गाँवों की आस्था इससे गहरी जुड़ी है—लोग कहते हैं कि यहाँ माँगी गई मन्नत खाली नहीं जाती। नवरात्रों में—चैत्र में, और स्थानीय मान्यता के अनुसार आश्विन में भी—मंदिर परिसर मेले में बदल जाता है और हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं।

  5. शिला माता मंदिर

    किंवदंती

    शिला माता मंदिर, जिसे हनुमानगढ़ शहर के भीतर बताया जाता है, उसकी कहानी एक पत्थर से शुरू होती है। मान्यता है कि यह चमत्कारी शिला घग्घर की धारा में बहती हुई यहाँ तक आई थी; स्थानीय लोगों ने उसे उठाकर स्थापित किया और पूजा शुरू कर दी। कहा जाता है कि यहाँ की परंपरा भी अनोखी है—भक्त माता को प्रसाद के रूप में मिठाई नहीं, बल्कि कच्चा दूध और नमक चढ़ाते हैं। बताया जाता है कि खासकर त्वचा से जुड़े रोगों से छुटकारा पाने की मन्नत लेकर लोग दूर-दूर से यहाँ पहुँचते हैं, और इन्हीं मन्नतों के लिए यह मंदिर सबसे अधिक जाना जाता है।

  6. गुरुद्वारा सुख सिंह मेहताब सिंह

    इतिहास और किंवदंती

    गुरुद्वारा सुखा सिंह मेहताब सिंह हनुमानगढ़ के प्रमुख सिख धर्मस्थलों में गिना जाता है। इसका नाम ही शौर्य की उन गाथाओं से जुड़ा है जो, कहा जाता है, यहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं — और यही वजह है कि श्रद्धालु इसे सिर्फ़ एक इमारत नहीं, एक याद की तरह देखते हैं। दिन भर संगत आती-जाती रहती है, अहाते में कीर्तन गूँजता रहता है और गुरुद्वारों की परंपरा के अनुसार लंगर हर आने वाले के लिए खुला रहता है।

  7. पल्लू की ब्रह्माणी माता मंदिर

    किंवदंती

    हनुमानगढ़ ज़िले के पल्लू कस्बे में बना ब्रह्माणी माता का मंदिर अपनी चमत्कारी ख्याति के लिए जाना जाता है। भक्त कहते हैं कि यहाँ सच्चे मन से माँगी गई मुराद अधूरी नहीं रहती। स्थानीय लोग बताते हैं कि हर महीने की अष्टमी पर यह बात दिख भी जाती है—आसपास के गाँवों से परिवार उमड़ पड़ते हैं, परिसर भर जाता है और कहा जाता है कि दर्शन की कतार दोपहर तक दरवाज़े के बाहर तक पहुँच जाती है।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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