
हर मोड़ की कहानी
जोधपुर
नीले रंग में रंगे मकानों वाला जोधपुर मारवाड़ की धरती का वह शहर है, जहाँ हर गली किसी न किसी कहानी को अपने साथ लिए चलती है। ऊँची पहाड़ी पर खड़ा किला, सफ़ेद पत्थर की शाही समाधियाँ, पुरानी राजधानी के बाग़ और बाज़ार की रौनक—यहाँ इतिहास और लोककथाएँ साथ-साथ चलती हैं। आइए, शहर के प्रमुख ठिकानों और उनसे जुड़ी कहानियों को करीब से जानें।
कहानियाँ
5 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
मेहरानगढ़ किला
इतिहास और किंवदंतीमेहरानगढ़ को अकसर भारत के सबसे बड़े किलों में गिना जाता है। इसकी नींव 1459 में राव जोधा ने रखी थी। कहा जाता है कि जिस पहाड़ी पर यह खड़ा है, वहाँ चीरिया नाथजी नाम के एक संन्यासी रहते थे। किले के लिए उन्हें वह जगह छोड़नी पड़ी और नाराज़ होकर उन्होंने अकाल का श्राप दे दिया। लोककथा के अनुसार श्राप शांत करने के लिए राजाराम मेघवाल नाम के एक व्यक्ति ने स्वयं आगे बढ़कर नींव में जीवित समाधि ली। किले का नाम मेहरानगढ़ पड़ा 'मेहरान' यानी सूर्य से। भीतर बना चामुंडा माता मंदिर राजपरिवार की इष्टदेवी का स्थान है।
उम्मेद भवन पैलेस
इतिहासउम्मेद भवन 1943 में बनकर तैयार हुआ था और इसे महाराजा उम्मेद सिंह ने बनवाया था; कहा जाता है कि काम 1928 में शुरू हुआ। उन दिनों मारवाड़ भीषण सूखे से जूझ रहा था और कुओं के साथ-साथ लोगों का काम भी सूख चला था; महल की नींव दरअसल राहत का काम थी, जिससे एक दशक से भी ज़्यादा समय तक हज़ारों हाथों को रोज़गार मिलता रहा। इसे 'छित्तर पैलेस' भी कहते हैं, क्योंकि यह छित्तर पहाड़ी पर खड़ा है और इसका पत्थर भी वहीं का है। आज यह इमारत तीन हिस्सों में बँटी है—एक हिस्से में शाही परिवार रहता है, दूसरा आलीशान होटल है और तीसरे में संग्रहालय सजा हुआ है।
जसवंत थड़ा
इतिहासदूधिया सफ़ेद पत्थर से बना जसवंत थड़ा अक्सर 'मारवाड़ का ताजमहल' कहलाता है। इसे महाराजा सरदार सिंह ने 1899 में अपने पिता महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में बनवाया था। यह जोधपुर के राठौड़ शासकों का शाही श्मशान स्थल है और यहीं उनकी समाधियाँ बनी हैं। पत्थर इतना महीन तराशा गया है कि धूप पड़ते ही पूरी इमारत भीतर से चमकती जान पड़ती है। मेहरानगढ़ के पास खड़ा यह स्मारक शहर के शोर से कटा हुआ एक शांत कोना है, जहाँ आने वाले देर तक बैठे रह जाते हैं।
मंडोर गार्डन
इतिहास और किंवदंतीमंडोर कभी मारवाड़ की राजधानी हुआ करता था; जोधपुर बसने से पहले सत्ता यहीं से चलती थी। लोककथा कहती है कि यही रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका था, और यहाँ मंडोर में रावण का एक मंदिर भी है। आज इस बाग़ में मारवाड़ के राजाओं के देवल यानी छतरियाँ कतार में खड़ी हैं, एक हॉल है जिसमें एक ही चट्टान काटकर गढ़ी गई विशाल मूर्तियाँ हैं — इलाके के लोक-नायक और उनके देवी-देवता — और ऊपर ढलान पर मंडोर के पुराने किले के खंडहर खड़े हैं। पेड़ों की छाँव में घूमते हुए यह जगह किसी खुली पुरानी किताब सी लगती है।
घंटाघर और सरदार मार्केट
इतिहासशहर के बीचोंबीच खड़ा घंटाघर जोधपुर की पहचान है। इसे महाराजा सरदार सिंह ने सौ साल से कुछ ज़्यादा पहले बनवाया था और तब से यह पुराने शहर की धड़कन बना हुआ है। इसके चारों ओर फैली सरदार मार्केट में सुबह से देर शाम तक भीड़ लगी रहती है—यहाँ राजस्थानी हस्तशिल्प, ढेरों मसाले, हथकरघे पर बुने कपड़े और चूड़ियों की दुकानें एक के बाद एक सजी मिलती हैं। खाने-पीने की गलियों की अपनी अलग ही खुशबू है। घड़ी की मीनार को निशान मानकर चलिए, फिर बाज़ार में खो जाने का डर नहीं रहता।
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