+91-7357-169-795
RJ Travel Junctionहर मोड़ पर एक नई कहानी।

हर मोड़ की कहानी

बांसवाड़ा

बांसवाड़ा राजस्थान का वह कोना है जहाँ रेगिस्तान की तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। 'सौ द्वीपों का शहर' और 'राजस्थान का चेरापूंजी' कहा जाने वाला यह जिला हरी वादियों, बहती नदियों और घने पहाड़ों से घिरा है। यहाँ की मिट्टी में आदिवासी संस्कृति, प्राचीन मंदिर और लोक-कथाएँ इस तरह घुली हैं कि हर पड़ाव अपने साथ एक कहानी लेकर चलता है और हर मोड़ पर कुछ नया खुलता है।

कहानियाँ

8 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. चाचा कोटा

    इतिहास और किंवदंती

    माही के बैकवाटर में फैला चाचा कोटा बांसवाड़ा का सबसे सुंदर नज़ारा माना जाता है, और सैलानी अक्सर इसकी तुलना केरल के बैकवाटर से करते हैं। पानी के बीच उठती छोटी-छोटी हरी पहाड़ियाँ ऐसी लगती हैं मानो द्वीप तैर रहे हों। यह पूरा इलाका वागड़ कहलाता है, और स्थानीय मान्यता है कि प्राचीन काल में यह घने जंगलों से ढका हुआ था। मानसून में बादल इन पहाड़ियों को छूते हुए गुज़रते हैं और लगता है जैसे प्रकृति ने यह जगह जान-बूझकर दुनिया से छिपाकर रखी हो।

  2. माही बजाज सागर बांध

    इतिहास

    माही बजाज सागर को राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा बांध माना जाता है और इसमें कुल सोलह गेट हैं। कहा जाता है कि जब बांध बना और पानी भरा, तो आसपास की कई छोटी पहाड़ियाँ आंशिक रूप से डूब गईं और पानी के ऊपर सिर्फ़ उनकी चोटियाँ बची रहीं; और यही बिखरी हुई हरी चोटियाँ बांसवाड़ा को 'सौ द्वीपों की धरती' नाम दिला गईं, ऐसा कहा जाता है। बांध की पाल पर खड़े होकर देखिए तो एक तरफ़ आधुनिक इंजीनियरिंग है और दूसरी तरफ़ कुदरत का वह रूप, जिसे इसी पानी ने नए सिरे से गढ़ दिया है।

  3. मानगढ़ धाम

    इतिहास

    मानगढ़ धाम को राजस्थान का जलियांवाला बाग कहा जाता है। 17 नवंबर 1913 को समाज सुधारक गोविंद गुरु के नेतृत्व में भील आदिवासी इस पहाड़ी पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ सभा के लिए जुटे थे। अंग्रेज़ी कमान की सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेरकर गोलियाँ चलाईं। कितने लोग मारे गए, इस पर आज भी मतभेद है — सरकारी दस्तावेज़ बहुत कम संख्या बताते हैं, जबकि आदिवासी जनश्रुति में लगभग पंद्रह सौ शहीदों की याद जीवित है। यह पहाड़ी आज उनका स्मारक है, जहाँ आने वाला हर व्यक्ति उस बलिदान के सामने कुछ देर ठहरता है और आज़ादी की कीमत को नए सिरे से समझता है।

  4. मां त्रिपुरा सुंदरी मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    बांसवाड़ा के पास उमराई गाँव में स्थित मां त्रिपुरा सुंदरी मंदिर को श्रद्धालु देश के सबसे पूजनीय शक्ति-स्थलों में मानते हैं। गर्भगृह में काले पत्थर की अठारह भुजाओं वाली भव्य प्रतिमा विराजमान है। मंदिर की वास्तविक आयु आज तक प्रमाणित नहीं हो सकी; मान्यता है कि यह सम्राट कनिष्क के कुषाण काल से भी पुराना है। कहा जाता है कि 'त्रिपुरा' नाम उन तीन पुरियों के कारण पड़ा—शक्तिपुरी, शिवपुरी और विष्णुपुरी—जो कभी इसके आसपास हुआ करती थीं। स्थानीय लोग माता को प्यार से 'तुरताई माता' कहते हैं और भरोसा करते हैं कि यहाँ मांगी गई मन्नत कभी खाली नहीं जाती।

  5. अर्थुना मंदिर समूह

    इतिहास

    अर्थुना का प्राचीन नाम 'उत्थुनाका' था और ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में यह वागड़ के परमार शासकों की राजधानी हुआ करती थी। उस दौर में यहाँ कलात्मक मंदिरों का एक पूरा समूह खड़ा था, जिसे वक़्त की मार ने खंडहरों में बदल दिया; कहा जाता है कि इसमें बाहरी आक्रमणों का भी हाथ रहा। आज भी बिखरे हुए शिव और जैन मंदिरों के अवशेष, उनकी बारीक नक्काशी और पुराने शिलालेख उस बीते वैभव की गवाही देते हैं। पत्थरों पर उकेरी आकृतियाँ देखकर अंदाज़ा होता है कि यहाँ के शिल्पी कितने कुशल रहे होंगे।

  6. मदारेश्वर महादेव मंदिर

    किंवदंती

    मदारेश्वर महादेव मंदिर शहर के पूर्वी हिस्से में एक ऊँची पहाड़ी पर बनी प्राकृतिक गुफा के भीतर बसा है और भगवान शिव को समर्पित है। कहा जाता है कि गुफा तक पहुँचने का रास्ता बेहद संकरा है, और मान्यता है कि प्राचीन काल में साधु-संत यहीं आकर एकांत में कठिन तपस्या किया करते थे। शिवरात्रि पर पूरा रास्ता भक्तों से भर जाता है और दर्शन के लिए लंबी कतार लगती है। ऊपर चोटी से पूरा बांसवाड़ा शहर एक साथ नज़र आता है और यह नज़ारा चढ़ाई की सारी थकान भुला देता है।

  7. अब्दुल्ला पीर दरगाह

    इतिहास और किंवदंती

    अब्दुल्ला पीर दरगाह दाऊदी बोहरा समुदाय के श्रद्धेय संत सय्यद अब्दुल रसूल शहीद की मज़ार है। परंपरा कहती है कि वे सदियों पहले इस इलाके में रहे और इंसानियत तथा अमन का पैग़ाम फैलाया—कितनी सदियाँ पहले, यह कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता। हर साल यहाँ उर्स भरता है, जिसमें दूर-दूर से बोहरा समुदाय के लोग पहुँचते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि खास बात यह है कि दुआ मांगने सिर्फ़ मुसलमान नहीं आते—हिंदू और दूसरे धर्मों के लोग भी उसी श्रद्धा से चादर चढ़ाते हैं, और यही, वे कहते हैं, इस दरगाह की सबसे सुंदर कहानी है।

  8. आनंद सागर झील / बाई तालाब

    इतिहास और किंवदंती

    आनंद सागर एक कृत्रिम झील है, जिसकी कहानी बांसवाड़ा के राजघराने से जुड़ी है। मान्यता इसे महारावल जगमाल सिंह की रानी लांची बाई से जोड़ती है — कुछ कहते हैं कि यह झील उन्होंने खुद बनवाई थी, तो कुछ कहते हैं कि महारावल ने उनके लिए बनवाई — और उन्हीं के नाम पर इसे 'बाई तालाब' कहा जाता है। झील के किनारे पवित्र कल्पवृक्ष खड़े हैं और कहा जाता है कि इनके नीचे खड़े होकर मांगी गई मुराद पूरी होती है। पास ही बांसवाड़ा के पुराने शासकों की खूबसूरत छतरियाँ बनी हैं। शाम के वक़्त पानी, पेड़ और पत्थर की ये छतरियाँ मिलकर एक शांत, पुराना-सा माहौल रच देती हैं।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

बताइए आपको कहाँ जाना है। सफ़र को यादगार बनाना हमारा काम है।