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हर मोड़ की कहानी

बाड़मेर

थार रेगिस्तान में बसा बाड़मेर राजस्थान का वह ज़िला है जहाँ सुनहरी रेत, लोकगीतों की गूँज और सदियों पुराना इतिहास एक साथ मिलते हैं। कहा जाता है कि तेरहवीं शताब्दी में बसे इस शहर को इसका नाम इसके संस्थापक रावत बहाड़ राव से मिला — बहाड़मेर, जो समय के साथ बाड़मेर हो गया। यहाँ के मंदिर, किले और ऊँचे धोरे यात्री को मरुधरा की असली आत्मा से मिलवाते हैं।

कहानियाँ

9 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. किराडू मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    बाड़मेर से करीब 35 किलोमीटर दूर हाथमा गाँव के पास पाँच प्राचीन मंदिरों का समूह खड़ा है, जिसकी बारीक नक्काशी के कारण इसे राजस्थान का खजुराहो कहा जाता है। इनके खंडहर होने की वजह इतिहास नहीं, लोककथा बताती है। कहा जाता है कि यहाँ ठहरे एक सिद्ध संत जब कुछ दिनों को बाहर गए, तो उनके बीमार शिष्यों की सुध केवल एक कुम्हारिन ने ली। लौटकर संत ने क्रोध में पूरे गाँव को पत्थर हो जाने का श्राप दे दिया। कुम्हारिन को भागने की छूट मिली, पर पीछे मुड़कर देखते ही वह भी पत्थर बन गई। कहा जाता है कि आज भी लोग सूरज ढलने के बाद यहाँ रुकने से बचते हैं।

  2. श्री नाकोड़ा जैन मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    बालोतरा के पास मेवानगर की पहाड़ियों में बसा यह तीर्थ देश के सबसे प्रतिष्ठित जैन तीर्थों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इस बस्ती को कभी वीरमपुर कहा जाता था, और परंपरा मंदिर की जड़ें तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक बताती है। गर्भगृह में भगवान पार्श्वनाथ की श्याम वर्ण पाषाण प्रतिमा विराजमान है। कहा जाता है कि आक्रमणों के दौर में प्रतिमा को छिपाकर सुरक्षित रखा गया और पंद्रहवीं शताब्दी में उसे लौटाकर फिर से प्रतिष्ठित किया गया, जब मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। यहाँ के अधिष्ठायक नाकोड़ा भैरव को चमत्कारी माना जाता है — भक्त कहते हैं कि उनके दर से कोई झोली खाली नहीं लौटती।

  3. रानी भटियानी मंदिर, जसोल

    इतिहास और किंवदंती

    बालोतरा से चार किलोमीटर और बाड़मेर से करीब सत्तानबे किलोमीटर दूर जसोल का यह मंदिर लोक देवी माजीसा को समर्पित है। परंपरा उन्हें स्वरूप कंवर बताती है — जैसलमेर की भाटी बेटी, लोकगीतों में राजकुमारी — जिनका विवाह जसोल के रावल कल्याण सिंह से हुआ कहा जाता है। कथा कहती है कि ईर्ष्या में जलती सौत ने उनके नन्हे बेटे लाल सिंह को ज़हर दे दिया और शोक में डूबी रानी भी जल्द ही चल बसीं। कहते हैं बाद में उन्होंने एक ढोली गायक को दर्शन दिए, तब जसोल के शासकों ने उनकी स्मृति में मंदिर बनवाया। आज भी मंगणियार कलाकार यहाँ माजीसा के भजन गाते हैं।

  4. बाड़मेर किला (गढ़ मंदिर)

    इतिहास

    बाड़मेर शहर के बीचोंबीच उठी पहाड़ी पर यह पुराना गढ़ खड़ा है। कहा जाता है कि रावत भीमा ने सन् 1552 में जूना से अपनी राजधानी यहाँ लाकर इसे बनवाया — जूना यानी पुराना बाड़मेर, जिसके खंडहर आज भी शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर हैं। किला उन्होंने चोटी पर नहीं, ढलान पर बनवाया, जहाँ पहाड़ी की बनावट ही सबसे बड़ा बचाव थी; और यहाँ से मीलों तक फैले रेगिस्तान पर नज़र रखी जा सकती थी। सबसे ऊपर जोगमाया का मंदिर है, जिसे गढ़ मंदिर कहते हैं, और उसी पहाड़ी पर कुछ नीचे नागणेच्या माता का मंदिर, जो बाड़मेर के शासकों की कुलदेवी मानी जाती हैं। जो ऊँचाई कभी पहरेदारी के काम आती थी, वही आज यात्रियों को पूरे शहर का विहंगम नज़ारा देती है।

  5. महाबार धोरे

    इतिहास और किंवदंती

    शहर से बस थोड़ी दूर महाबार के ऊँचे धोरे उस मरुस्थली अनुभव का वादा करते हैं जिसके लिए लोग जैसलमेर तक जाते हैं। ये टीले कभी एक जैसे नहीं रहते — थार की तेज़ हवाएँ सदियों से इनकी शक्लें बदलती आई हैं, और हर मौसम में रेत की लहरें नए सिरे से बन जाती हैं। कहा जाता है कि पुराने वक्त में यही रास्ते व्यापारिक कारवाँओं के थे, जो ऊँटों के साथ रेगिस्तान पार करते थे। आज शाम ढलते ही यहाँ लोग जुटते हैं — ऊँट की सवारी, ढलती धूप में सुनहरी रेत और डूबते सूरज का नज़ारा।

  6. ब्रह्मा जी मंदिर, आसोतरा

    इतिहास और किंवदंती

    पुष्कर के अलावा दुनिया में गिने-चुने ही मंदिर हैं जहाँ ब्रह्मा जी की विधिवत पूजा होती है, और आसोतरा का यह मंदिर उन्हीं में गिना जाता है — इसे पुष्कर के बाद दूसरा बड़ा ब्रह्मा धाम कहा जाता है, हालाँकि यह मान्यता भर है, कोई दर्ज तथ्य नहीं। इसकी स्थापना संत खेताराम जी महाराज ने करवाई। कहा जाता है कि उन्हें स्वप्न में आदेश मिला था कि इसी जगह ब्रह्मा जी का मंदिर बने। मंदिर की प्रतिष्ठा 1984 में हुई, और कहा जाता है कि उसके ठीक अगले दिन संत खेताराम जी ने समाधि ले ली — मानो जीवन का सौंपा हुआ काम पूरा हो चुका था।

  7. खेड़ (रणछोड़राय मंदिर)

    इतिहास और किंवदंती

    लूणी नदी के किनारे बसा खेड़ आज एक शांत कस्बा भर लगता है, पर मान्यता है कि कभी यही राठौड़ राजवंश की शुरुआती राजधानी था। ख्यातों में कहा जाता है कि राव सीहा और उनके वंशजों ने इस इलाके को जीतकर यहीं से मारवाड़ में अपने शासन की नींव रखी थी। पुराने किले के अवशेषों के साथ यहाँ भगवान विष्णु का प्रसिद्ध रणछोड़राय मंदिर भी है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। स्थानीय मान्यता है कि आसपास फैले रेतीले टीलों के नीचे अब भी कई ऐतिहासिक राज़ दबे पड़े हैं, जिन तक कोई नहीं पहुँच सका।

  8. सिवाना किला (गढ़ सिवाना)

    इतिहास और किंवदंती

    बालोतरा ज़िले के सिवाना कस्बे में खड़ा यह पहाड़ी दुर्ग परंपरा के अनुसार वीर नारायण पंवार का बनवाया माना जाता है, हालाँकि कुछ स्रोत उन्हें दसवीं शताब्दी में रखते हैं तो कुछ ग्यारहवीं में। इसकी स्थिति ऐसी थी कि इसे जालौर दुर्ग की कुंजी कहा जाता रहा है, और मुश्किल वक्त में मारवाड़ के राजा यहीं शरण लेते रहे। यह किला 1308 ईस्वी के उस घेरे के लिए याद किया जाता है, जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना यहाँ आ डटी। उसी वर्ष वीर सातलदेव काम आए, और लोकगीत उनके साथ सोमेश्वर का नाम लेते हैं — वह शाका आज तक यहाँ की स्मृति में जीवित है।

  9. पचपदरा झील

    इतिहास और किंवदंती

    पचपदरा राजस्थान की मशहूर खारे पानी की झील है, जहाँ रेत और नमक की परतें एक-दूसरे में घुली दिखती हैं। कहा जाता है कि करीब चार सौ साल पहले पंचा नाम के एक भील ने इस दलदली ज़मीन को सुखाकर झील के आसपास बस्तियाँ बसाई थीं, और तभी से यह जगह उन्हीं के नाम से पचपदरा कहलाती है। यहाँ खारवाल समुदाय के लोग पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक विधि से नमक बनाते हैं — मोरली की झाड़ी की टहनियाँ खारे पानी में डाल दी जाती हैं और उन पर नमक के रवे जम जाते हैं। यह नमक अपनी असाधारण रूप से ऊँची सोडियम क्लोराइड मात्रा के लिए जाना जाता है।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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