
हर मोड़ की कहानी
जालोर
राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी कोने में बसा जालोर वह शहर है जिसे प्राचीन ग्रंथों में जाबालिपुर कहा गया। ग्रेनाइट की पहाड़ियों पर खड़े इसके दुर्ग, अरावली की चोटियों पर बसे मंदिर और यहाँ के लोगों का स्वाभिमान—सब मिलकर एक ऐसी कहानी बुनते हैं जो सदियों पुरानी है। हर किले की दीवार और हर देवालय के पीछे यहाँ एक किस्सा छिपा बैठा है।
कहानियाँ
5 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
जालोर दुर्ग (स्वर्णगिरि किला)
इतिहास और किंवदंतीजालोर शहर से लगभग 1100 फुट ऊपर, ग्रेनाइट की खड़ी चट्टान पर बना स्वर्णगिरि दुर्ग सदियों तक भारत के सबसे दुर्गम किलों में गिना जाता रहा। अलाउद्दीन खिलजी की सेना 1310 में कान्हड़देव चौहान के जालोर पर बढ़ी और 11 मई 1311 को किला गिरा। कहा जाता है कि मुख्य द्वार वर्षों तक टिका रहा; कि एक लालची सरदार ने पीछे का कच्चा रास्ता बता दिया; और कि सुल्तान ने रातों-रात शहर भर की सरसों खरीदकर छिड़कवाई, ताकि उगते अंकुर नम और कमज़ोर चिनाई दिखा दें। मारवाड़ की एक मशहूर कहावत उसी रात से जुड़ी बताई जाती है। कान्हड़देव और उनके पुत्र वीरमदेव लड़ते हुए खेत रहे; किले की स्त्रियों ने, परंपरा के अनुसार, जौहर किया।
तोपखाना
इतिहास और किंवदंतीजालोर शहर के ठीक बीच खड़ी यह इमारत आज तोपखाना कहलाती है, पर इसकी शुरुआत बिलकुल अलग थी। कहा जाता है कि परमार राजा भोज ने इसे एक विशाल संस्कृत पाठशाला और देवालय के रूप में बनवाया था, जहाँ दूर-दराज़ से विद्यार्थी पढ़ने आते थे; सदी को लेकर मतभेद है, पर इमारत सल्तनत काल से कहीं पुरानी है। अलाउद्दीन खिलजी के अधिकार में आने के बाद इसे मस्जिद में बदल दिया गया, और बहुत बाद में यह तोपों का भंडार बनी — तभी से इसका यह नाम पड़ा। खंभों और मेहराबों पर बची बारीक नक्काशी आज भी उसके पुराने रूप की गवाही देती है।
सुंधा माता मंदिर
इतिहास और किंवदंतीअरावली की ऊँची पहाड़ियों पर बसा सुंधा माता मंदिर जालोर का सबसे पूजनीय ठिकाना है। कहा जाता है कि यह स्थान लगभग नौ सौ साल पुराना है; यहाँ चामुंडा देवी को सुंधा माता के रूप में पूजा जाता है। परंपरा के अनुसार यहाँ प्रतिमा के केवल शीश की आराधना होती है—मान्यता है कि सती का मस्तक यहीं गिरा था। पहाड़ी की कंदराओं की भी अपनी कथाएँ हैं—लोकस्मृति कहती है कि युद्ध के दिनों में जालोर और आसपास के राजपूत शासकों ने इनमें शरण ली, आस्था के साथ-साथ यह सामरिक ठौर भी रही। ऊपर तक पहुँचने के लिए यहाँ राजस्थान का पहला रोपवे चला, जिससे घाटी का नज़ारा और खुल जाता है।
श्री सिरे मंदिर
इतिहास और किंवदंतीकलशाचल पहाड़ी पर समुद्र तल से करीब 646 मीटर की ऊँचाई पर बना श्री सिरे मंदिर जालोर का सबसे शांत कोना माना जाता है। कहा जाता है कि इस शिवालय को शासक रतन सिंह ने उस भूमि पर बनवाया था, जिसे लंबे समय से महर्षि जाबालि की पावन तपोभूमि माना जाता रहा है। मान्यता है कि महर्षि ने यहीं कठोर तप किया, और उन्हीं के नाम से पूरे क्षेत्र को प्राचीन काल में जाबालिपुर कहा गया। एक दूसरी लोककथा जोड़ती है कि अज्ञातवास के दिनों में पांडवों ने भी इस पहाड़ी पर कुछ समय बिताया था। चढ़ाई के बाद मिलती हवा और सन्नाटा यात्रियों को यहाँ रुक जाने पर मजबूर कर देता है।
जहाज मंदिर (मंडवाला)
इतिहासमंडवाला का जहाज मंदिर पूरी तरह सफ़ेद संगमरमर से बना एक जैन तीर्थ है, जिसकी बनावट राजस्थान से कहीं आगे तक चर्चा का विषय रही है। इसकी नींव सन् 1993 में रखी गई थी, पर मंदिर बनकर तैयार और प्रतिष्ठित 1999 में हुआ—पत्थर दर पत्थर इसे हूबहू एक पानी के जहाज़ की शक्ल दी गई। जैन अनुयायियों के लिए यही इसकी असली बात है: जैसे जहाज़ यात्रियों को समुद्र पार उतारता है, वैसे ही धर्म की नाव इंसान को संसार-सागर से पार ले जाती है। दोपहर की धूप में चमकता सफ़ेद संगमरमर इस रूपक को रूपक ही नहीं रहने देता।
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