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हर मोड़ की कहानी

झुंझुनूं

राजस्थान के शेखावाटी अंचल में बसा झुंझुनू एक ऐसा शहर है जहाँ दीवारें खुद कहानियाँ सुनाती हैं। यहाँ की पुरानी हवेलियाँ, उन पर बने रंग-बिरंगे भित्तिचित्र और सदियों पुराने किले इसे दुनिया भर के यात्रियों और कला प्रेमियों के लिए खास बनाते हैं। मारवाड़ी व्यापारियों की समृद्धि, राजपूत और कायमखानी शासकों का इतिहास तथा लोक आस्था के मंदिर — सब कुछ इस जिले की गलियों में साथ-साथ मिलता है।

कहानियाँ

6 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. राणी सती मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    झुंझुनू शहर का यह मंदिर भारत के सबसे बड़े और प्रसिद्ध सती मंदिरों में गिना जाता है। यह नारायणी देवी को समर्पित है, जिन्हें श्रद्धालु प्रेम से 'दादी जी' पुकारते हैं। लोककथा कहती है कि महाभारत काल में अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने अगले जन्म में नारायणी देवी के रूप में जन्म लिया था। इसी कथा के अनुसार, छल से उनके पति तनधन दास की हत्या कर दी गई, तो उन्होंने दुश्मनों का डटकर सामना किया और अंत में पति की चिता के साथ सती हो गईं। इसी जगह उनकी स्मृति में मंदिर खड़ा किया गया, हालाँकि वह कितना पुराना है इस पर मत अलग-अलग हैं; और आज भी यहाँ दूर-दूर से भक्त पहुँचते हैं।

  2. खेतड़ी महल

    इतिहास और किंवदंती

    झुंझुनू के मुख्य शहर में खड़े इस महल को लोग यहाँ का 'हवा महल' कहते हैं। इसे खेतड़ी के महाराजा भोपाल सिंह ने बनवाया था, और इसका निर्माण-काल आमतौर पर लगभग 1770 के आसपास माना जाता है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि इसमें न खिड़कियाँ हैं और न दरवाज़े — केवल खंभों और मेहराबों की कतारें, जिनके बीच से हवा पूरे महल में अपने आप बहती रहती है, इसलिए गर्मी में भी भीतर ठंडक बनी रहती है। कहा जाता है कि जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह इसकी बनावट से इतने मोहित हुए कि उन्होंने इसी से प्रेरणा लेकर जयपुर का विश्वप्रसिद्ध हवा महल बनवाया।

  3. सोने-चांदी की हवेली

    इतिहास

    महनसर गाँव की यह हवेली शेखावाटी की चित्रकला का सबसे चमकदार नमूना मानी जाती है। उन्नीसवीं सदी में पोद्दार परिवार के व्यापारियों ने इसे बनवाया था। कहा जाता है कि इसकी दीवारों और छतों की चित्रकारी में असली सोने और चांदी के रंगों का इस्तेमाल हुआ है, और इसी वजह से इसका यह नाम पड़ा। भीतर बने चित्रों में रामायण के प्रसंग, कृष्ण की लीलाएँ और विष्णु के अवतार इतनी बारीकी से उकेरे गए हैं कि सिर उठाकर देखते रहने का मन करता है — डेढ़ सौ साल से ज़्यादा बीत जाने पर भी इनकी चमक फीकी नहीं पड़ी है।

  4. बादलगढ़ किला

    इतिहास

    झुंझुनू शहर के ऊपर एक ऊँची पहाड़ी पर बना यह किला कायमखानी नवाब फजल खान ने खड़ा करवाया था। कहा जाता है कि यह काम सत्रहवीं सदी के आखिर में हुआ, हालाँकि इस बारे में अलग-अलग स्रोत अलग-अलग बात कहते हैं। झुंझुनू पर पहले चौहान शासकों का अधिकार था, जो बाद में कायमखानी नवाबों के हाथ में चला गया। परंपरा के अनुसार यह किला किसी शौक से नहीं, बल्कि नवाब के ऊँटों और घोड़ों के अस्तबल के रूप में बनाया गया था। आज इसकी प्राचीर पर खड़े होकर पूरा झुंझुनू शहर एक ही नजर में दिखाई देता है, और ढलती शाम में यह नजारा और भी सुंदर लगता है।

  5. डुंडलोद किला

    इतिहास

    डुंडलोद कस्बे का यह किला आमतौर पर 1750 का माना जाता है, जब सरदूल सिंह के सबसे छोटे बेटे का शासन था। कहा जाता है कि इसकी बनावट में राजपूत और मुगल शैली इतनी सहजता से घुल-मिल गई है कि दोनों को अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है। भीतर बने 'दीवान-ए-खास' के बारे में बताया जाता है कि उसमें नक्काशीदार कांच की खिड़कियाँ और दुर्लभ पुरानी किताबों से भरा पुस्तकालय है। आज यह ऐतिहासिक किला एक खूबसूरत हेरिटेज होटल में बदल चुका है, जहाँ मेहमान उन्हीं कमरों में ठहरकर पुराने राजसी ठाट-बाट का स्वाद ले सकते हैं।

  6. मोदी और टिबरेवाला हवेली

    इतिहास

    झुंझुनू की ये जुड़वां हवेलियाँ शेखावाटी के धनी मारवाड़ी व्यापारियों की जीवनशैली का आईना हैं। इनकी दीवारों पर बनी पेंटिंग्स सिर्फ देवी-देवताओं तक सीमित नहीं हैं — यहाँ आपको ब्रिटिश दौर की रेलगाड़ियाँ और विदेशी पोशाक पहने लोग भी चित्रित मिलेंगे। ये दोनों हवेलियाँ मिलकर बताती हैं कि उस समय के सेठ बाहरी दुनिया से कितने जुड़े हुए थे और हर नई-नवेली चीज को अपनी दीवारों पर दर्ज कर लेना उन्हें कितना भाता था। कला में रुचि रखने वालों के लिए यह जगह घंटों ठहरने लायक है।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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