
हर मोड़ की कहानी
भीलवाड़ा
राजस्थान का भीलवाड़ा 'टेक्सटाइल सिटी' यानी कपड़ों के शहर के नाम से पहचाना जाता है, पर इसकी असली दौलत इसका इतिहास और लोकसंस्कृति है। कहा जाता है कि शहर का नाम यहाँ बसी भील जनजाति से मिला, जिसने कभी महाराणा प्रताप को अकबर के विरुद्ध लड़ाई में साथ दिया था। आसपास फैले किले, झरने, मंदिर और गुरुद्वारे हर यात्री को अपनी अलग कहानी सुनाते हैं।
कहानियाँ
7 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
मेनाल जलप्रपात और महानालेश्वर शिव मंदिर
इतिहास और किंवदंतीभीलवाड़ा से लगभग 80 किलोमीटर दूर कोटा मार्ग पर बसा मेनाल प्रकृति और इतिहास का संगम है। बारहवीं सदी में यह इलाका चाहमान यानी चौहान राजवंश के अधीन था। जनश्रुति है कि पृथ्वीराज चौहान को यहाँ की ठंडी, शांत वादियाँ इतनी भाती थीं कि उन्होंने अपने लिए यहीं एक महल बनवा लिया। कहा जाता है कि यहाँ का झरना लगभग 150 फीट की ऊँचाई से गिरता है और पूरी घाटी को गुँजा देता है। पास ही तराशे हुए पत्थरों से बना प्राचीन महानालेश्वर शिव मंदिर है, जिसकी बारीक नक्काशी के कारण लोग इसे मिनी खजुराहो कहते हैं।
हरणी महादेव
इतिहास और किंवदंतीभीलवाड़ा शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर — दूरी को लेकर अलग-अलग स्रोत अलग बात कहते हैं — हरी पहाड़ियों की गोद में हरणी महादेव विराजते हैं। स्थानीय मान्यता है कि यहाँ का शिवलिंग किसी ने स्थापित नहीं किया, वह स्वयं धरती से प्रकट हुआ था। परंपरा मंदिर के निर्माण को डारक परिवार के पूर्वजों से जोड़ती है, पर इसका कोई प्रामाणिक समय दर्ज नहीं है। हर महाशिवरात्रि पर यहाँ तीन दिन का बड़ा मेला भरता है, जब दूर-दराज़ के गाँवों से श्रद्धालु दर्शन और मन्नत लेकर पहुँचते हैं। पास ही उसी पहाड़ी पर चामुंडा माता का मंदिर है, और यात्री अक्सर दोनों जगह माथा टेककर लौटते हैं।
बदनौर किला
इतिहास और किंवदंतीभीलवाड़ा से करीब 70 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर सात मंज़िला बदनौर किला आज भी तनकर खड़ा है। परंपरा के अनुसार इसकी नींव परमार वंश के राजा बदना ने रखी थी। मेवाड़ के लिए यह किला सिर्फ़ रिहाइश नहीं, एक अहम सैन्य ठिकाना था, जिस पर बार-बार लड़ाइयाँ हुईं और जो मेवाड़ तथा मुगलों के बीच कई बार हाथ बदलता रहा। भीतर ऊँचे दरवाज़े और मंदिर हैं, और कहा जाता है कि महल तथा जलाशय भी। ये राजपूत वास्तुकला की बारीकी दिखाते हैं और उस दौर के वैभव और शौर्य की कहानी चुपचाप सुनाते रहते हैं।
पुर की उड़न छतरी
किंवदंतीभीलवाड़ा के उपनगर पुर में देवडूंगरी पहाड़ी पर स्थित उड़न छतरी देखने वालों को चकित कर देती है। यह विशाल प्राकृतिक चट्टान के सिरे पर टिकी है — इसे गढ़ा गया या यह चट्टान का स्वाभाविक रूप है, इस पर मतभेद है — और नीचे से देखने पर ऐसी लगती है मानो हवा में तैर रही हो। कुछ कहते हैं कि इसी भ्रम से इसका नाम पड़ा; कुछ और ही कथा सुनाते हैं कि आकाश मार्ग से जाती एक छतरी को किसी संत ने इसी पहाड़ी पर उतार लिया। मान्यता है कि तभी से यह पहाड़ी संत-साधुओं की रही है। यही कौतूहल इसे भीलवाड़ा की सबसे अनोखी निशानियों में गिनाता है।
बागोर साहिब गुरुद्वारा
इतिहास और किंवदंतीमांडल तहसील के बागोर गाँव में बना यह गुरुद्वारा सिख श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष पवित्र स्थान है। परंपरा कहती है कि सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह जी, अपनी यात्रा के दौरान कुछ समय इसी जगह ठहरे थे; यह पड़ाव लोकस्मृति में सहेजा गया है, किसी तिथि-अंकित दस्तावेज़ में नहीं। कहा जाता है कि गुरु जी के उसी प्रवास और उनकी उपस्थिति की स्मृति में यहाँ बागोर साहिब गुरुद्वारे की स्थापना हुई। आज भी हर धर्म के लोग यहाँ शीश नवाने आते हैं, अरदास करते हैं और आशीर्वाद की अनुभूति लेकर लौटते हैं।
कोटड़ी चारभुजानाथ मंदिर
किंवदंतीभीलवाड़ा से करीब 30 किलोमीटर दूर कोटड़ी गाँव में भगवान विष्णु का चारभुजानाथ मंदिर है, जिससे राजस्थान के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है। भक्त इन्हें प्यार से 'कोटड़ी के श्याम' पुकारते हैं और लोक कथाएँ कहती हैं कि यहाँ माँगी गई कोई मन्नत अधूरी नहीं रहती। हर साल जलझूलनी एकादशी पर यहाँ विशाल मेला भरता है और चारभुजानाथ नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। परंपरा के अनुसार ठाकुरजी की प्रतिमा को रथ में विराजमान कर धूमधाम से जलाशय तक ले जाया जाता है और स्नान कराया जाता है।
बिजोलिया
इतिहासबिजोलिया का नाम इतिहास की किताबों में दो वजहों से दर्ज है। एक ओर यहाँ मंदाकिनी मंदिर और शिव मंदिरों का समूह खड़ा है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे चौहान शासकों के समय के हैं; उनकी दीवारों पर उकेरी वास्तुकला देखते ही बनती है। दूसरी ओर यही धरती बिजोलिया किसान आंदोलन की जन्मभूमि है, जिसे अक्सर भारत का सबसे लंबा चला अहिंसक किसान आंदोलन कहा जाता है। यहाँ मिले प्राचीन शिलालेख, जिन्हें बिजोलिया अभिलेख कहा जाता है, इतिहास प्रेमियों के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं।
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