
हर मोड़ की कहानी
चित्तौड़गढ़
चित्तौड़गढ़ में भारत का सबसे विशाल किला है — मैदान से ऊपर उठी पहाड़ी पर लगभग 700 एकड़ में फैला हुआ — और राजस्थान का सबसे भारी इतिहास। यह किला तीन बार लूटा गया, और तीनों बार यहाँ की स्त्रियों ने बंदी बनने के बजाय आग को चुना। आज यहाँ विजय का एक स्तंभ खड़ा है, वह महल जहाँ एक धाय ने अपना ही बेटा वार दिया, और उस रानी का मंदिर जो यह सब छोड़कर गाने चली गई।
कहानियाँ
8 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
चित्तौड़गढ़ किला
इतिहासअकसर कहा जाता है कि चित्तौड़गढ़ भारत का सबसे विशाल और भव्य किला है, और राजपूती शौर्य, त्याग तथा बलिदान की गाथाएँ इसकी दीवारों में बसी हैं। यह दुर्ग करीब 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर बना है और लगभग 700 एकड़ के विस्तार में फैला हुआ है। इसके भीतर महल, स्तंभ, कुंड और मंदिर किसी पूरे नगर की तरह बसे हैं। हर दरवाज़ा और हर खंडहर मेवाड़ के उन दिनों की याद दिलाता है जब इस चट्टान को बचाने के लिए पीढ़ियों ने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था, और यहाँ सुनाई जाने वाली कथाएँ राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध कहानियों में गिनी जाती हैं।
विजय स्तम्भ
इतिहासकिले के बीचोंबीच खड़ा विजय स्तम्भ चित्तौड़ की पहचान है, जिसे अंग्रेज़ी में टावर ऑफ़ विक्ट्री कहा जाता है। महाराणा कुंभा ने इसे पंद्रहवीं सदी में बनवाया था — निर्माण का वर्ष अक्सर 1448 बताया जाता है, हालाँकि इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं — और कहा जाता है कि यह मालवा और गुजरात के सुल्तानों की संयुक्त सेनाओं पर मिली जीत की याद में खड़ा किया गया था। नौ मंज़िला यह इमारत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी हर मंज़िल पर की गई नक्काशी भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना मानी जाती है। सँकरी सीढ़ियों से ऊपर चढ़िए तो पूरा दुर्ग पैरों तले फैला दिखाई देता है।
महासती जौहर स्थल
इतिहास और किंवदंतीयह जगह चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर है और चित्तौड़ के सबसे गौरवशाली तथा सबसे पीड़ादायक इतिहास की गवाह रही है। यहीं राजपूत स्त्रियों ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए धधकती अग्नि में प्रवेश कर जौहर किया था। दुर्ग ने तीन बड़े जौहर देखे। पहला 1303 का जौहर किंवदंती में जीवित है — कहा जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय रानी पद्मिनी के नेतृत्व में सोलह हज़ार वीरांगनाओं ने जौहर किया। दूसरा 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के हमले पर राजमाता कर्मावती के साथ तेरह हज़ार महिलाओं ने किया। और तीसरा 1568 में अकबर की चढ़ाई के समय हुआ, जिसका नेतृत्व परंपरा रानी फूल कंवर को बताती है। अब यहाँ केवल मौन शेष है।
रानी पद्मिनी महल
इतिहास और किंवदंतीपानी से घिरे कुंड के बीचोंबीच बना यह तीन मंज़िला सफ़ेद महल चित्तौड़गढ़ दुर्ग की सबसे चर्चित इमारत है। कहानी कहती है कि दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने जब रानी पद्मिनी के रूप की चर्चा सुनी तो वह उन्हें देखने को बेचैन हो उठा। कहा जाता है कि रावल रतन सिंह ने उसे महल के सामने लगे एक बड़े शीशे में रानी का सिर्फ़ प्रतिबिंब देखने की इजाज़त दी। लोक कथा है कि उस एक झलक ने खिलजी का लालच और बढ़ा दिया और उसने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी।
गोमुख कुंड
इतिहास और किंवदंतीचित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर बना यह जलकुंड एक अविरल प्राकृतिक स्रोत से भरता है और सदियों से दुर्ग की प्यास बुझाता आया है। यहाँ चट्टान में बने एक गौमुख से पानी लगातार बहता रहता है और इसी आकृति के कारण इसका नाम गोमुख पड़ा। कहा जाता है कि पुराने समय में रानियाँ और राजपरिवार की स्त्रियाँ अपने महलों से एक गुप्त सुरंग के रास्ते यहाँ स्नान करने आती थीं, ताकि किसी की नज़र उन पर न पड़े। कुंड के पास ही, जल के किनारे, एक प्राचीन शिव मंदिर बना हुआ है।
राणा कुंभा महल
इतिहास और किंवदंतीचित्तौड़गढ़ दुर्ग का यह महल परिसर सबसे पुराना और सबसे विशाल कहा जाता है। उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदय सिंह का जन्म इन्हीं दीवारों के भीतर हुआ था। परंपरा कहती है कि यहीं स्वामिभक्त धाय पन्ना धाय ने राजकुमार उदय सिंह के प्राण बचाने के लिए अपने सगे बेटे चंदन का बलिदान दे दिया था। महल के नीचे बने वे तहखाने आज भी यात्रियों को दिखाए जाते हैं, जिन्हें किंवदंती जौहर का स्थल मानती है। हर पत्थर यहाँ एक फ़ैसले की गवाही देता है।
मीराबाई मंदिर
इतिहास और किंवदंतीकहा जाता है कि कुंभश्याम मंदिर महाराणा कुंभा ने बनवाया था; उसी के परिसर में यह छोटा-सा सुंदर मंदिर बना है, जो कृष्ण-भक्त मीराबाई को समर्पित है। मीरा मेवाड़ के राजकुमार भोजराज की पत्नी थीं, पर उनका मन महल की चहल-पहल में नहीं, कृष्ण के चरणों में रमता था। कहते हैं वे अपना अधिकतर समय यहीं भजन गाते और गिरधर की भक्ति में लीन बिताती थीं। लोक कथा है कि उन्हें मारने के लिए भेजा गया विष का प्याला भी कृष्ण कृपा से अमृत बन गया था।
कीर्ति स्तम्भ
इतिहासकीर्ति स्तम्भ यानी टावर ऑफ़ फ़ेम बाईस मीटर ऊँचा है और इसे आम तौर पर सात मंज़िला बताया जाता है, हालाँकि यह गिनती अलग-अलग स्रोतों में अलग मिलती है। कहा जाता है कि इसे बारहवीं शताब्दी में दिगंबर जैन व्यापारी जीजाजी काठोड ने बनवाया था, पर यह तिथि विवादित है। यह स्तंभ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है और इसकी दीवारों पर दिगंबर परंपरा की बारीक मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। विजय स्तम्भ के मुक़ाबले यहाँ भीड़ कम रहती है, पर पत्थर पर हुई कारीगरी के शौकीनों के लिए यह दुर्ग का सबसे शांत और शायद सबसे मनभावन कोना है।
आगे बढ़िए
रास्ते में आगे

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।
बताइए आपको कहाँ जाना है। सफ़र को यादगार बनाना हमारा काम है।


