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RJ Travel Junctionहर मोड़ पर एक नई कहानी।

हर मोड़ की कहानी

पुष्कर

अरावली की गोद में बसा पुष्कर वह तीर्थ है जिसे तीर्थराज यानी तीर्थों का राजा कहा जाता है। अजमेर से महज़ पंद्रह किलोमीटर दूर यह छोटा-सा कस्बा हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों में गिना जाता है। पवित्र झील, घाटों की सीढ़ियाँ, संकरी बाज़ार गलियाँ और पहाड़ी पर बने मंदिर — यहाँ हर मोड़ पर कोई न कोई पौराणिक कहानी साँस लेती हुई मिल जाती है।

कहानियाँ

4 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. ब्रह्मा मंदिर

    किंवदंती

    कहा जाता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा यज्ञ के लिए उपयुक्त भूमि खोज रहे थे। उन्होंने अपने हाथ से एक कमल नीचे गिराया और जहाँ वह फूल गिरा, वहाँ एक सुंदर झील उभर आई — कथा के अनुसार पुष्प और कर से ही नाम बना पुष्कर। यज्ञ के शुभ मुहूर्त पर उनकी पत्नी सावित्री नहीं पहुँच सकीं, तो ब्रह्मा ने स्थानीय ग्वालिन गायत्री से विवाह कर अनुष्ठान पूरा किया। पहुँचकर सावित्री क्रोधित हुईं और शाप दिया कि ब्रह्मा की पूजा संसार में केवल इसी भूमि पर होगी। यही वजह है कि दुनिया भर में ब्रह्मा का प्रमुख मंदिर यहीं माना जाता है।

  2. पुष्कर झील और 52 घाट

    इतिहास और किंवदंती

    पुष्कर की पूरी पहचान इसी झील से है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह ब्रह्मा के गिराए कमल से अस्तित्व में आई। पानी के चारों ओर बावन घाट सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरते हैं और हर घाट की अपनी परंपरा है; इनमें गौ घाट और वराह घाट सबसे प्रसिद्ध घाटों में गिने जाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा की सुबह हजारों श्रद्धालु यहाँ डुबकी लगाते हैं, इस विश्वास के साथ कि यह स्नान जीवन भर के पाप धो देता है और मोक्ष का द्वार खोलता है। स्थानीय लोककथाएँ इस जल को त्वचा रोगों में भी लाभकारी बताती हैं। शाम को दीपों और घंटियों के बीच झील का नज़ारा देखने लायक होता है।

  3. सावित्री माता मंदिर

    किंवदंती

    रत्नागिरी पहाड़ी की चोटी पर बना यह मंदिर ब्रह्मा की पत्नी सावित्री को समर्पित है। कथा कहती है कि यज्ञ में अपनी जगह किसी और को बैठा देखकर उन्होंने ब्रह्मा को ऐसा शाप दिया कि उनकी पूजा केवल पुष्कर तक सिमट गई। कहा जाता है कि क्रोध और वैराग्य में वे नीचे बसे नगर को छोड़कर इस ऊँची चोटी पर चली आईं और तपस्या में लीन हो गईं। आज भी बहुत से श्रद्धालु लंबी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचते हैं। सुबह की पहली किरण हो या ढलता सूरज, यहाँ से पूरा पुष्कर, उसकी पवित्र झील और दूर तक फैले रेत के टीले एक ही नज़र में दिखाई देते हैं।

  4. वराह मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    पुष्कर के सबसे प्राचीन देवालयों में गिना जाने वाला यह मंदिर भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित है। पुराणों में कथा आती है कि हिरण्याक्ष नाम के दैत्य ने पृथ्वी को उठाकर समुद्र की गहराई में छिपा दिया था; तब विष्णु ने विशाल वराह यानी जंगली सूअर का रूप धरा, दैत्य का संहार किया और पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाकर सुरक्षित बाहर ले आए। कहा जाता है कि यहाँ बारहवीं सदी से मंदिर खड़ा है। बाद में मुग़ल शासक जहाँगीर ने वराह प्रतिमा तुड़वाकर मंदिर का बड़ा हिस्सा ध्वस्त करा दिया, और फिर इसी स्थान पर इसे दोबारा खड़ा किया गया — अधिकांश विवरणों में इसका श्रेय मारवाड़ के महाराजा बख्त सिंह को दिया जाता है।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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