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हर मोड़ की कहानी

झालावाड़

राजस्थान का झालावाड़ ज़िला पानी से घिरे नज़ारों, संतरों के बाग़ों और समृद्ध विरासत के लिए जाना जाता है; इसे राजस्थान का चेरापूंजी और नागपुर भी कहा जाता है। इसकी शुरुआत 1791 में कोटा के दीवान झाला ज़ालिम सिंह ने मराठा हमलों से बचने के लिए एक छावनी के रूप में की थी, और 1838 में यह अलग रियासत बनी जिसके पहले शासक राणा मदन सिंह हुए।

कहानियाँ

7 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. गागरोन का किला

    इतिहास और किंवदंती

    गागरोन का किला बिना किसी नींव के, सीधी खड़ी चट्टान पर टिका भारत का इकलौता ऐसा दुर्ग माना जाता है। आहू और काली सिंध — ये दो नदियाँ इसे तीन ओर से घेरे रहती हैं, इसीलिए इसे जलदुर्ग कहा गया। कहा जाता है कि बारहवीं सदी में डोड राजा बीजलदेव ने इसकी शुरुआत की, और फिर लगभग तीन सौ साल तक यहाँ खींची राजाओं का शासन रहा। जनश्रुति है कि जब हमलावर सेनाएँ किले तक पहुँचीं, तो हज़ारों राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया। आज यह यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में है; सूफ़ी संत मीठे शाह की दरगाह इसके द्वार पर है और भीतर कृष्ण-हनुमान के प्राचीन मंदिर खड़े हैं।

  2. गढ़ पैलेस / झालावाड़ किला

    इतिहास

    झालावाड़ शहर के ठीक बीचोबीच खड़ा गढ़ पैलेस, जिसे झालावाड़ किला भी कहते हैं, महाराज राणा मदन सिंह ने अपने राजकीय निवास और शासन के केंद्र के रूप में बनवाया था। बाहर से यह किसी किले जैसा दिखता है, पर भीतर पहुँचते ही महल का रूप खुलता है। इसकी असली दौलत दीवारों पर है — हाड़ौती शैली की बारीक चित्रकारी और भित्तिचित्र, जिनके रंग आज भी ठहरे हुए लगते हैं। ये चित्रित कक्ष यूँ ही सबके लिए खुले नहीं रहते; कहा जाता है कि इन्हें देखने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है, इसलिए इनमें रुचि रखने वाले यात्री अक्सर पहले से पूछकर आते हैं।

  3. भवानी नाट्यशाला

    इतिहास

    झालावाड़ के गढ़ पैलेस परिसर में बनी भवानी नाट्यशाला महाराज राणा भवानी सिंह ने 1921 में बनवाई थी और यह भारत के सबसे अनोखे रंगमंचों में गिनी जाती है। इसका खाका यूरोप के ओपेरा हाउसों और पारसी थिएटर की शैली से लिया गया था। सबसे दिलचस्प इसकी बनावट है — मंच के नीचे भूमिगत रास्ते बनाए गए थे, ताकि नाटक के बीच रथ और घोड़े मानो पाताल से निकलकर अचानक दर्शकों के सामने आ जाएँ। उस दौर में यह तकनीक किसी जादू से कम नहीं थी, और आज भी सूने सभागार की कल्पना करते ही वह दृश्य आँखों में जाग उठता है।

  4. झालरापाटन का सूर्य मंदिर

    इतिहास

    झालावाड़ के जुड़वाँ शहर झालरापाटन को घंटियों का शहर कहा जाता है, और उसकी सबसे ऊँची पहचान यहाँ का सूर्य मंदिर है। कहा जाता है कि यह दसवीं शताब्दी में बना था, हालाँकि इसके निर्माण काल को लेकर स्रोत एकमत नहीं हैं। 97 फीट ऊँचा यह मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है। इसके शिखर, मंडप और दीवारों पर की गई नक्काशी तथा मूर्तियाँ देखकर कई यात्रियों को खजुराहो के मंदिर याद आ जाते हैं। इसे सात सहेलियों का मंदिर और पद्मनाभ मंदिर भी कहा जाता है। सुबह की रोशनी में इसका पुराना पत्थर सुनहरा दिखने लगता है।

  5. चंद्रभागा मंदिर

    इतिहास

    चंद्रभागा नदी के किनारे खड़े ये प्राचीन मंदिर झालरापाटन की सबसे शांत जगहों में से हैं। इनके खंभों और मेहराबों पर की गई बारीक नक्काशी देखने लायक है। इसी समूह का शीतलेश्वर महादेव मंदिर राजस्थान का सबसे पुराना तिथि-अंकित शिव मंदिर माना जाता है, यानी वह मंदिर जिस पर निर्माण की तारीख खुदी हुई मिलती है; आज यह राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहाँ चंद्रभागा मेला और पशु मेला लगता है, जब घाट पर स्नान करने वालों और दूर-दराज़ से आए व्यापारियों की भीड़ इस सुनसान तट को जीवंत कर देती है।

  6. कोलवी की बौद्ध गुफाएँ और स्तूप

    इतिहास

    झालावाड़ से कुछ दूर कोलवी गाँव की पहाड़ियों में चट्टानें काटकर बनाई गई ये बौद्ध गुफाएँ भारत में बौद्ध धर्म के फैलाव की चुपचाप गवाही देती हैं। इन्हें प्रायः हीनयान परंपरा से जुड़ा हुआ बताया जाता है, हालाँकि इस पर सभी स्रोत एकमत नहीं हैं। यहाँ पत्थर में ही तराशे गए स्तूप और ध्यान कक्ष हैं, जहाँ कभी भिक्षु रहते और साधना करते थे। गुफाओं की संख्या और उनकी बनावट देखकर इन्हें राजस्थान का एलोरा कहा जाने लगा। पर्यटकों की भीड़ से दूर होने के कारण यहाँ आज भी वही सन्नाटा मिलता है जिसकी तलाश में कभी भिक्षु इन पहाड़ियों तक चले आए होंगे।

  7. संत पीपाजी पैनोरमा

    इतिहास और किंवदंती

    परंपरा के अनुसार गागरोन के राजा प्रताप राव खींची ने एक दिन राजपाट छोड़कर स्वामी रामानंद का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया और आगे चलकर संत पीपाजी के नाम से पहचाने गए। भक्ति आंदोलन के बड़े संतों में उनकी गिनती होती है। झालावाड़ का यह पैनोरमा उन्हीं की यात्रा को सहेजता है — सिंहासन से वैराग्य तक का पूरा सफ़र चित्रों, मूर्तियों और दृश्य-झाँकियों के ज़रिए क्रम से दिखाया गया है। किलों और मंदिरों के बीच दिनभर घूमते यात्रियों के लिए यहाँ का रंग अलग है — पत्थर और तारीख़ों से हटकर एक ज़िंदगी और उस एक फ़ैसले की कहानी।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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