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हर मोड़ की कहानी

सीकर

राजस्थान का सीकर ज़िला शेखावाटी अंचल का दिल है, जहाँ रेत के टीलों के बीच बुलंद किले, रंगों से सजी हवेलियाँ और आस्था से भरे मंदिर एक साथ मिलते हैं। यहाँ की भित्ति-चित्रकारी वाली हवेलियाँ और चमत्कारी धार्मिक स्थल देश-विदेश के यात्रियों को खींच लाते हैं, और धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन में यह छोटा-सा ज़िला आज बड़े शहरों से भी आगे निकल चुका है।

कहानियाँ

6 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. खाटू श्याम जी मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    खाटू श्याम जी की कथा किंवदंती के अनुसार महाभारत तक जाती है। कहा जाता है कि भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के पास तीन ऐसे बाण थे जो अकेले ही पूरा युद्ध खत्म कर सकते थे, और उन्होंने वचन लिया था कि जो पक्ष कमज़ोर पड़ेगा वे उसी की ओर से लड़ेंगे। परंपरा कहती है कि कृष्ण समझ गए कि इससे पांडवों की हार तय है, इसलिए ब्राह्मण का वेश धरकर उन्होंने बर्बरीक से शीश माँग लिया। बर्बरीक ने हँसते हुए दे दिया और कृष्ण ने उन्हें अपना ही नाम श्याम देकर कलियुग में पूजे जाने का वर दिया। सफ़ेद संगमरमर का यह मंदिर और पास का श्याम कुंड आज भी श्रद्धालुओं से भरे रहते हैं।

  2. जीण माता मंदिर

    किंवदंती

    अरावली की पहाड़ियों में बसा यह मंदिर, जिसे श्रद्धालु प्राचीन शक्तिपीठ मानते हैं, लोक-कथाओं से घिरा है। कहते हैं माता का असली नाम जयंती बाई था और अपने भाई हर्ष से उन्हें बहुत लगाव था। एक दिन कुएँ पर भाभी के साथ इस बात पर ठन गई कि पहले किसका मटका उतरेगा; हर्ष ने अनजाने में पत्नी का मटका पहले उतार दिया। आहत होकर जयंती पहाड़ों में तपस्या करने चली गईं और मनाने आए हर्ष भी लौटे नहीं, पास की चोटी पर तप में लीन हो गए। एक कथा यह भी है कि औरंगज़ेब की सेना पर मधुमक्खियों का झुंड टूट पड़ा, और बादशाह को क्षमा माँगकर अखंड जोत के लिए तेल भेजना पड़ा।

  3. हर्षनाथ मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    सीकर से कुछ दूर अरावली की करीब 3,000 फुट ऊँची पहाड़ी पर दसवीं सदी का यह शिव मंदिर खड़ा है। मान्यता है कि बहन जीण माता के वैराग्य से दुखी हर्ष ने इसी चोटी पर शिव की आराधना की और आगे चलकर भैरव रूप में पूजे गए। मुख्य मंदिर महामेरु शैली में बना बताया जाता है। औरंगज़ेब के हमले में इसे गहरी चोट पहुँची, फिर भी आज बिखरे खंभे और नक्काशीदार पत्थर उसकी पुरानी भव्यता की गवाही देते हैं। ऊपर से दिखता विस्तार और आसपास घूमती विशाल पवनचक्कियाँ यात्रियों को सबसे ज़्यादा लुभाती हैं।

  4. लक्ष्मणगढ़ किला

    इतिहास

    सीकर शहर से करीब तीस किलोमीटर दूर लक्ष्मणगढ़ का किला शेखावाटी की शान माना जाता है। इसे उन्नीसवीं सदी में सीकर के राव राजा लक्ष्मण सिंह ने बनवाया था; निर्माण का वर्ष प्रायः 1805 के आसपास बताया जाता है, हालाँकि इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। सबसे दिलचस्प बात इसकी बुनियाद है — किला बड़ी-बड़ी बिखरी चट्टानों पर टिका है, मानो पहाड़ ही दीवार बन गया हो। ऊपर पहुँचकर पूरा कस्बा किसी नक्शे की तरह नीचे फैला दिखता है, और गलियों में बनी हवेलियाँ, बाज़ार और मंदिर एक ही नज़र में समा जाते हैं।

  5. देवगढ़ किला

    इतिहास

    सीकर से थोड़ी ही दूरी पर एक पहाड़ी की चोटी पर देवगढ़ का शांत किला बैठा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे राव राजा देवी सिंह ने 1787 में बनवाया था — हालाँकि साल को लेकर स्रोत एकमत नहीं हैं। यह सीकर की स्थापना के करीब सौ साल बाद बना, यानी रियासत के शुरुआती नहीं, बाद के दौर की निशानी है। परंपरा के अनुसार यह सुरक्षा चौकी और सामरिक ठिकाना था — यहाँ से मीलों दूर तक हलचल पर नज़र रखी जाती थी, और मुश्किल वक्त में राजपरिवार के लिए यह सुरक्षित जगह भी बनता था। आज तोपों की जगह कैमरे चढ़ते हैं; सुबह की चढ़ाई, खंडहर होते बुर्ज और ऊपर से दिखता सूर्योदय इसे ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का पसंदीदा ठिकाना बना देते हैं।

  6. गणेश्वर धाम

    इतिहास और किंवदंती

    नीमकाथाना के पास बसा गणेश्वर धाम इतिहास और आस्था दोनों का ठिकाना है। खुदाई में यहाँ ताम्रयुगीन सभ्यता के निशान मिले हैं, जिन्हें कुछ जानकार सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराना बताते हैं, हालाँकि तिथियों को लेकर विद्वानों में मतभेद है — तांबे के औज़ार और मनके बताते हैं कि हज़ारों साल पहले यहाँ कारीगरों की बस्ती धड़कती थी। कथा कहती है कि यह गालव ऋषि की तपोभूमि रही। मुख्य आकर्षण गालव कुंड है, जहाँ पहाड़ के भीतर से गंधक मिला गर्म पानी चौबीसों घंटे बहता रहता है; लोगों का विश्वास है कि इसमें डुबकी लगाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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