
हर मोड़ की कहानी
अलवर
अरावली की गोद में बसा अलवर राजस्थान का 'सिंह द्वार' कहलाता है — वह चौखट जहाँ से मरुभूमि का इतिहास शुरू होता है। यहाँ के किले, झीलें, छतरियाँ और जंगल के मंदिर सिर्फ़ पत्थर नहीं हैं; हर एक के पीछे कोई श्राप, कोई प्रेम कहानी या कोई पौराणिक प्रसंग साँस लेता है। घूमने आइए, कहानियाँ खुद आपसे बात करेंगी।
कहानियाँ
6 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
भानगढ़ किला
किंवदंतीभानगढ़ को अक्सर भारत की सबसे डरावनी जगह कहा जाता है। लोककथा कहती है कि यहाँ की राजकुमारी रत्नावती अपने रूप के लिए मशहूर थीं। सिंघिया नाम का एक तांत्रिक उन पर मोहित हो गया और काले जादू से उन्हें वश में करना चाहा। राजकुमारी ने चाल भाँप ली और जादू की शीशी एक चट्टान पर दे मारी; वही चट्टान लुढ़ककर तांत्रिक पर आ गिरी। मरते हुए उसने श्राप दिया कि यह नगरी उजड़ जाएगी और यहाँ के लोग कभी मुक्त नहीं होंगे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने आज भी सूर्यास्त के बाद किले में घुसने पर रोक लगा रखी है।
सिलीसेढ़ झील और पैलेस
इतिहास और किंवदंतीअलवर से कुछ ही दूर सिलीसेढ़ की झील पहाड़ियों के बीच शीशे-सी फैली है और उसके किनारे खड़ा है एक शाही महल। इसे महाराजा विनय सिंह ने बनवाया था — अधिकतर विवरणों के अनुसार 1845 के आसपास — और वजह, परंपरा कहती है, बेहद रूमानी थी। कहते हैं राजा को शीला नाम की एक साधारण गाँव की लड़की से प्रेम हो गया। कहा जाता है कि उन्होंने उससे विवाह किया, उसे रानी शीला का मान दिया और अपनी प्रिय के लिए यह झील तथा किनारे का महल तैयार करवाया। आज सूरज ढलते वक़्त पानी पर पड़ती सुनहरी रोशनी उसी प्रेम कहानी की याद दिलाती है।
मूसी महारानी की छतरी
इतिहासअलवर शहर के बीचोबीच खड़ी यह दो मंज़िला छतरी महाराजा बख़्तावर सिंह और उनकी संगिनी मूसी महारानी की स्मृति में बनी है। कहा जाता है कि महाराजा के निधन पर मूसी महारानी ने उनकी चिता के साथ सती होने का निर्णय लिया। बाद में महाराजा विनय सिंह ने उसी बलिदान की याद में यह भव्य स्मारक खड़ा करवाया। रामायण और महाभारत के प्रसंग यहाँ की छतों पर भित्तिचित्रों के रूप में इतनी बारीकी से चित्रित हैं कि यहाँ आने वाला हर व्यक्ति देर तक ठिठककर उन्हें निहारता रह जाता है। अलवर के इतिहास का यह सबसे भावुक अध्याय है।
पांडुपोल हनुमान मंदिर
किंवदंतीसरिस्का के जंगल के भीतर बसा यह मंदिर महाभारत काल की एक कथा से जुड़ा है। कहा जाता है कि वनवास के दिनों में पांडव इसी वन से गुज़र रहे थे कि रास्ते में एक विशाल चट्टान आ खड़ी हुई। अपनी ताक़त पर इतराते भीम ने गदा के एक प्रहार से उसमें चौड़ा रास्ता — 'पोल' — बना दिया, और मान्यता है कि वही नाम पांडुपोल बन गया। आगे हनुमान जी बूढ़े वानर का रूप धरकर लेट गए और अपनी पूँछ हटाने की चुनौती दी। भीम पूरा ज़ोर लगाकर भी उसे हिला न सके और उनका अभिमान चूर हो गया। यहाँ हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा पूजी जाती है।
बाला किला (अलवर किला)
इतिहास और किंवदंतीअरावली की एक चोटी पर फैला बाला किला अलवर शहर की सबसे पुरानी इमारत कहा जाता है। परंपरा इसे निकुम्भ राजपूतों का बनवाया हुआ मानती है, हालाँकि इसके बनने का समय अलग-अलग स्रोत दसवीं सदी से लेकर बाद तक बताते हैं। लोग इसे 'कुँवारा किला' कहते हैं, क्योंकि किंवदंती है कि युद्ध में इसे कभी किसी बड़े राजा ने जीता नहीं, न ही कोई हमला इसे लूट सका — यही अजेय होने की छवि इसके नाम में बस गई। कहा जाता है कि बाबर और बाद में जहाँगीर ने यहाँ कुछ वक़्त बिताया था। ऊपर से शहर का नज़ारा आज भी सैलानियों को रोक लेता है।
राजा भर्तृहरि मंदिर
किंवदंतीसरिस्का के पास के घने जंगलों में बना यह मंदिर एक राजा के सन्यासी बन जाने की कथा सुनाता है। परंपरा के अनुसार, उज्जैन के प्रतापी और विद्वान राजा भर्तृहरि अपनी रानी पिंगला से बेहद प्रेम करते थे। कथा कहती है कि जिस दिन उन्हें रानी के विश्वासघात का पता चला, संसार से उनका मोह टूट गया। कहा जाता है कि उन्होंने राजपाट छोड़ा, गुरु गोरखनाथ के शिष्य बने और अलवर के इन्हीं जंगलों में वर्षों कठिन तपस्या की। जहाँ कभी सिर्फ़ सन्नाटा था, वहाँ आज लाखों श्रद्धालु आते हैं और यह जगह आस्था का बड़ा केंद्र बन चुकी है।
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