
हर मोड़ की कहानी
जयपुर
गुलाबी नगरी के नाम से पहचाने जाने वाले जयपुर की गलियाँ, किले और महल सिर्फ़ पत्थर नहीं हैं—हर दीवार के पीछे एक किस्सा साँस लेता है। कहीं रानियों के झरोखे हैं, कहीं झील में डूबा आरामगाह, कहीं दुनिया की सबसे बड़ी तोप तो कहीं तारों की चाल नापते पत्थर के यंत्र। आइए, शहर के मशहूर ठिकानों और उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियों से मिलते हैं।
कहानियाँ
6 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
हवा महल
इतिहासहवा महल को 1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने बनवाया था। वे कृष्ण भक्त थे, और कहा जाता है कि इसीलिए महल का आकार कृष्ण के मुकुट जैसा गढ़ा गया। असली वजह और भी दिलचस्प है—उस दौर में राजपूत घरानों में पर्दा प्रथा सख्ती से निभाई जाती थी और रानियाँ आम भीड़ के सामने नहीं आ सकती थीं। राजा चाहते थे कि वे शहर के त्योहार, तीज-गणगौर की सवारी और बाज़ार की रौनक बिना दिखे निहार सकें। इसीलिए इसमें 953 नन्हे झरोखे बनाए गए, जिनसे बहती ठंडी हवा महल को गर्मियों में भी शीतल रखती है।
जल महल
इतिहास और किंवदंतीमानसागर झील के बीचोंबीच तैरता-सा दिखने वाला यह महल जिस पानी पर खड़ा है, वह भी मानव-निर्मित है। जयपुर बसने से बहुत पहले आमेर के राजा मान सिंह ने इलाके को सूखे से उबारने और पानी की आपूर्ति पक्की करने के लिए दरभावती नदी पर बांध बंधवाया और उसके पीछे यह झील ठहर गई—नाम आज भी उन्हीं का है। महल के बारे में कहा जाता है कि इसे लगभग 1699 में सवाई जय सिंह ने बनवाया, हालाँकि कुछ विवरण बाद के शासकों को श्रेय देते हैं। जनश्रुति है कि भव्य अश्वमेध यज्ञ के बाद वे, रानियाँ और पंडित यहीं स्नान और विश्राम करते थे। दूर से यह एकमंजिला लगता है, पर मंज़िलें पाँच हैं—नीचे की चार पानी में डूबी रहती हैं।
आमेर किला
इतिहास और किंवदंतीअरावली की पहाड़ी पर खड़ा आमेर कभी जयपुर के राजाओं की राजधानी था। यह महल राजा मानसिंह प्रथम ने बनवाया और उनके बाद आने वाले राजाओं ने इसे और बढ़ाया। इसकी आत्मा दो जगहों में बसती है—शीला माता मंदिर और शीश महल। कहा जाता है कि बंगाल में राजा केदार को हराकर लौटते समय मानसिंह वहाँ के समुद्र से काली माँ की एक शिला साथ लाए, जो यहाँ स्थापित हुई और शीला माता कहलाई। शीश महल में एक अकेली मोमबत्ती जलते ही दर्पणों से जड़ी छत हज़ारों तारों-सी झिलमिला उठती है—कहते हैं इसे बाद के किसी राजा ने रानी के लिए बनवाया, ताकि वे महल के भीतर ही खुले आसमान का सुख पा सकें।
जयगढ़ किला
इतिहास और किंवदंतीआमेर किले के ठीक ऊपर तना यह किला सवाई जय सिंह द्वितीय ने आमेर महल और शाही परिवार की हिफ़ाज़त के लिए एक सैन्य दुर्ग के रूप में खड़ा किया था; अधिकतर विवरण इसका निर्माण 1726 में हुआ बताते हैं। इसे विजय का किला भी कहते हैं। यहाँ जयबाण तोप रखी है, जिसे पहियों पर चलने वाली दुनिया की सबसे बड़ी तोप कहा जाता है। किंवदंती है कि इसे पहली और आख़िरी बार परखने के लिए दागा गया, तो गोला करीब 35 किलोमीटर दूर चाकसू जा गिरा और वहाँ एक बड़ा तालाब बन गया। किले से जुड़ी दूसरी मशहूर कहानी कछवाहा वंश के गुप्त खज़ाने की है, जिसकी तलाश में सत्तर के दशक में यहाँ भारी सरकारी खुदाई भी हुई थी।
नाहरगढ़ किला
इतिहास और किंवदंतीजयपुर शहर की ओर मुँह किए, उसके ऊपर की पहाड़ी पर खड़ा यह किला 1734 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। पहले इसका नाम सुदर्शनगढ़ सोचा गया था, पर नाम बदलने के पीछे जो कारण बताया जाता है वह विशुद्ध लोक-कथा है। कहते हैं जिस ज़मीन पर किला उठ रहा था, वह नाहर सिंह भौमिया नाम के एक दिवंगत राजपूत योद्धा की थी। दिनभर मज़दूर दीवारें चिनते और रात होते-होते वे ढह जातीं। कथा के अनुसार तांत्रिकों ने राजा को बताया कि नाहर सिंह की आत्मा अपनी ज़मीन पर किला बनना नहीं चाहती। उनके नाम का एक छोटा-सा मंदिर आज भी किले के भीतर है, और दुर्ग का नाम पड़ा नाहरगढ़—यानी नाहर का घर। कहा जाता है कि इसके बाद ही काम पूरा हो सका।
जंतर मंतर
इतिहासयह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जिसे खगोलशास्त्र के दीवाने राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1730 के दशक में बनवाया—हालाँकि यह ठीक-ठीक कब पूरा हुआ, इस पर स्रोत आज भी एकमत नहीं। नाम का अर्थ भी सीधा है—जंतर यानी यंत्र और मंतर यानी गणना। जय सिंह को तारों और ग्रहों की चाल पढ़ने का गहरा शौक था। उस ज़माने में समय नापने की भरोसेमंद घड़ियाँ थीं नहीं, सो उन्होंने पत्थर के विशाल वैज्ञानिक यंत्र गढ़वा दिए। यहीं खड़ी है दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की धूपघड़ी, सम्राट यंत्र, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आज भी धूप और परछाईं के सहारे स्थानीय समय महज़ दो सेकंड की चूक के साथ बता देती है।
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