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हर मोड़ की कहानी

बूंदी

राजस्थान का बूंदी 'बावड़ियों का शहर' और 'हाड़ौती की रानी' कहलाता है। इसकी गलियों में शौर्य, चित्रकला और अनोखी प्रेम कहानियाँ एक साथ बसती हैं। शहर का नाम बूंदा मीणा से आया, और 1242 ईस्वी में राव देवा हाड़ा ने इसे जीतकर यहाँ हाड़ा राजवंश की नींव रखी। किले, बावड़ियाँ, झीलें और भित्ति चित्र — बूंदी हर कोने पर कोई न कोई कहानी सुनाता है।

कहानियाँ

6 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. तारागढ़ किला और गढ़ पैलेस

    इतिहास और किंवदंती

    कहा जाता है कि अरावली की पहाड़ियों पर लगभग 1354 ईस्वी में राव बर सिंह हाड़ा ने यह किला बनवाया, हालाँकि तिथि और निर्माता — दोनों पर स्रोत एकमत नहीं हैं। नीचे का हिस्सा गढ़ पैलेस कहलाता है और ऊपर का दुर्ग तारागढ़। परंपरा के अनुसार दूर से यह टिमटिमाते तारे जैसा दिखता था, इसीलिए यह नाम पड़ा। सबसे चर्चित निशानी है 'गर्भ गुंजन' तोप — कहा जाता है कि उसकी गूंज इतनी भयानक थी कि गर्भवती स्त्रियों और पशुओं तक पर असर पड़ जाता, और तोपची गोला दागते ही पास के कुंड में कूद जाते थे ताकि कानों के पर्दे सलामत रहें। लेखक रुडयार्ड किपलिंग को तो यह किला इंसानी हाथों की कारीगरी लगा ही नहीं।

  2. रानीजी की बावड़ी

    इतिहास और किंवदंती

    बूंदी की बावड़ियों में सबसे भव्य मानी जाने वाली यह बावड़ी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना कही जाती है। इसे 1699 ईस्वी में रानी नाथावती ने बनवाया था, जो बूंदी के राव राजा अनिरुद्ध सिंह की छोटी रानी थीं; राजा का देहांत इससे तीन साल पहले ही हो चुका था। कहा जाता है कि बड़ी रानी से मतभेद के बीच, बेटे के जन्म के बाद उन्होंने अपना मन प्रजा की सेवा में लगा दिया। सूखे के दिनों में शहर को पानी मिलता रहे, यही सोचकर उन्होंने यह बावड़ी खुदवाई। सीढ़ियों के साथ उतरती नक्काशी और इसके तोरण द्वार इतने सुंदर हैं कि लोग इसे 'बावड़ियों की रानी' कहते हैं।

  3. चौरासी खंभों की छतरी

    इतिहास और किंवदंती

    जटिल नक्काशी वाली यह दो मंजिला छतरी बूंदी की सबसे अनोखी इमारतों में गिनी जाती है। इसे आमतौर पर 1683 ईस्वी का माना जाता है, जब राव राजा अनिरुद्ध सिंह ने इसे अपने धाभाई देवा की याद में बनवाया — देवा उनकी धाय माँ के बेटे थे और राजा उनसे बहुत स्नेह रखते थे। निचले तल पर चौरासी नक्काशीदार खंभे हैं, और परंपरा इस संख्या को दो तरह से पढ़ती है: जन्म-मरण के उस चक्र के रूप में जिससे गुज़रकर जीव मोक्ष तक पहुँचता है, या कामसूत्र की चौरासी मुद्राओं के रूप में। पत्थर पर नर्तकियाँ, वादक, हाथी और हिरण बड़ी बारीकी से उकेरे गए हैं।

  4. सुख महल और जैत सागर झील

    इतिहास और किंवदंती

    जैत सागर झील के किनारे बना सुख महल कभी बूंदी के राजाओं का ग्रीष्मकालीन ठिकाना हुआ करता था। इसे राजा उम्मेद सिंह के समय का बताया जाता है, हालाँकि इसे किस शासक ने बनवाया, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। कहते हैं इसके दरवाज़े पूरे चंदन की लकड़ी के थे — झील से आती ठंडी हवा जब उन दरवाज़ों से टकराकर भीतर पहुँचती, तो पूरा महल चंदन की महक और ठंडक से भर उठता था। ब्रिटिश लेखक रुडयार्ड किपलिंग सचमुच 1880 के दशक में राजपूताना की अपनी यात्रा के दौरान यहाँ ठहरे थे, पर उनका मशहूर उपन्यास 'किम' बरसों बाद, इन कमरों से बहुत दूर लिखा गया था।

  5. चित्रशाला (उम्मेद महल)

    इतिहास

    गढ़ पैलेस के ऊपरी हिस्से में बनी चित्रशाला भित्ति चित्रों का खज़ाना कही जाती है। इसे महाराव उम्मेद सिंह ने बनवाया था, जो भगवान रंगनाथ के परम भक्त थे और जिनका शासनकाल आमतौर पर अठारहवीं सदी के मध्य का माना जाता है। शुरुआत में यह जगह उनका निजी दरबार-कक्ष और राजपरिवार के विश्राम का महल हुआ करती थी। फिर इसकी दीवारों पर बूंदी चित्रशैली में कृष्ण की लीलाएँ, रामायण के प्रसंग और दरबार की शान प्राकृतिक रंगों से उकेरी गईं। सोने और खनिज रंगों से बने ये चित्र सदियों बाद आज भी उतने ही चमकीले दिखाई देते हैं।

  6. भीमलत महादेव और झरना

    किंवदंती

    बूंदी शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर जंगल के बीच गिरता यह झरना महाभारत काल की एक लोककथा से जुड़ा है। एक कथा के अनुसार, अज्ञातवास के दिनों में पांडव इसी घने वन से गुज़र रहे थे और द्रौपदी को तेज़ प्यास लगी। आसपास पानी का कोई स्रोत नहीं था, तब अपनी ताकत के लिए मशहूर भीम ने गदा या लात से ज़मीन पर ज़ोरदार प्रहार किया। चट्टान फट गई और पानी की धारा फूट पड़ी। कहा जाता है कि इसी से इस जगह का नाम 'भीमलत' पड़ा। झरने के पास एक शिव मंदिर है, जिसे परंपरा में प्राचीन माना जाता है।

आपकी राजस्थान की कहानी यहीं से शुरू होती है।

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