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हर मोड़ की कहानी

डूंगरपुर

राजस्थान के दक्षिणी छोर पर बसा डूंगरपुर 'पहाड़ों की नगरी' कहलाता है। कहा जाता है कि 1258 ईस्वी में मेवाड़ के रावल वीर सिंह ने यह नगर बसाया था। तब यहाँ डूंगरिया नाम के भील मुखिया का राज था, और युद्ध में उन्हें हराने के बाद वीर सिंह ने उन्हीं के नाम पर शहर का नाम रखा। हरी पहाड़ियाँ, शांत झीलें और वागड़ की लोक-कथाएँ यहाँ की पहचान हैं।

कहानियाँ

7 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था

  1. गैब सागर झील और बादल महल

    इतिहास

    शहर के ठीक बीच में फैली गैब सागर झील डूंगरपुर की सबसे शांत जगह है। इसके किनारे पर खड़ा बादल महल स्थानीय पारेवा पत्थर से बना है, जिसकी हरी-नीली आभा पानी में झलकती रहती है। इसकी बनावट के बारे में कहा जाता है कि उसमें राजपूत ठाठ और मुगल कारीगरी की बारीकी दोनों घुल-मिल गई हैं। परंपरा के अनुसार महल कभी शाही परिवार का विश्राम गृह था — राजा-महाराजा यहाँ मेहमानों को ठहराते और झील से आती ठंडी हवा में फुर्सत के पल बिताते थे। शाम ढलते ही गुंबदों का प्रतिबिंब पानी पर बिखर जाता है।

  2. कालीबाई स्मारक

    इतिहास

    गैब सागर के किनारे ही वागड़ की सबसे साहसी बेटी कालीबाई का स्मारक पार्क बना है। बात 1947 की है, जब डूंगरपुर रियासत ने रास्तापाल गाँव का स्कूल बंद कराने की कोशिश की और रियासत के अफ़सर व सिपाही वहाँ के गुरुजी को गाड़ी के पीछे बाँधकर घसीटने लगे। यह देखकर आदिवासी बालिका कालीबाई, जिसकी उम्र बारह या तेरह साल बताई जाती है, दौड़ी और अपनी हँसिया से रस्सी काट दी। सिपाहियों ने उस बच्ची पर गोली चला दी और वह घावों से चल बसी। शिक्षा के लिए दिया गया उसका बलिदान आज भी इस अंचल की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

  3. जूना महल

    इतिहास और किंवदंती

    धनमाता पहाड़ी की तलहटी में खड़ा जूना महल बाहर से महल कम, किला ज़्यादा लगता है। सात मंज़िलों की यह इमारत एक बार में नहीं बनी — अलग-अलग शासकों ने अपने-अपने समय में इसे ऊपर की ओर बढ़ाते रहे; परंपरा के अनुसार इसकी शुरुआत तेरहवीं सदी में मानी जाती है, हालाँकि इस तिथि को लेकर मतभेद है। भीतर की भित्ति चित्रकारी और शीशे का काम आज भी जीवंत है। स्थानीय लोग बताते हैं कि गलियारे जान-बूझकर भूलभुलैया जैसे बनाए गए थे, ताकि कोई हमलावर भीतर घुस भी जाए तो रास्तों में उलझा रह जाए और पहरेदार उसे आसानी से पकड़ लें।

  4. बेणेश्वर धाम

    इतिहास और किंवदंती

    डूंगरपुर से कुछ दूर सोम, माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसा बेणेश्वर धाम आदिवासी समाज का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, जिसे लोग 'आदिवासियों का कुंभ' कहते हैं। यहाँ की सबसे अनोखी बात यह है कि पूजा एक खंडित शिवलिंग की होती है। कथा है कि एक गाय के खुर की चोट से यह शिवलिंग पाँच जगह से टूट गया था। परंपरा में टूटी मूर्ति की पूजा नहीं होती, पर यहाँ की जिस परंपरा को लोग संत मावजी से जोड़ते हैं, उसी के चलते इसी खंडित लिंग की पूरे विधि-विधान से आराधना होती आ रही है।

  5. देव सोमनाथ मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    सोम नदी के किनारे सफेद पत्थरों से बना देव सोमनाथ मंदिर इतना पुराना है कि अब कोई दस्तावेज़ इसकी उम्र तय नहीं करता — परंपरा से इसे करीब आठ सौ साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि इसे पहाड़ियों की ओट में इस तरह बसाया गया कि दूर से नज़र ही न आए; यह सुरक्षा का पुराना तरीका था। लोग इसकी बनावट की तुलना गुजरात के सोमनाथ से करना पसंद करते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात इसकी बनावट है: इसे जोड़ने में चूना, सीमेंट या गारा कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ; पत्थरों को एक-दूसरे के खाँचों में फँसाकर खड़ा किया गया है, और यही जोड़ सदियों से इन्हें थामे हुए है।

  6. उदय विलास पैलेस

    इतिहास

    महारावल उदय सिंह द्वितीय का बनवाया उदय विलास पैलेस आज एक लक्ज़री हेरिटेज होटल है, पर उसका रुतबा वैसा ही है। महल स्थानीय पारेवा पत्थर से गढ़ा गया है, जिसकी नीली-स्लेटी छटा दिन के हर पहर बदलती दिखती है। इसका सबसे अनोखा हिस्सा भीतर बना 'एक थंबिया महल' है — बारीक नक्काशी से भरा एक मंडप, जो सिर्फ़ एक मुख्य खंभे के सहारे टिका है। यह मंडप उस महल से भी पुराना है जो आज इसे घेरे हुए है — इसे उदय सिंह ने नहीं, बल्कि पहले के शासक महारावल शिव सिंह ने ज्ञान कंवर की स्मृति में एक शिवालय के रूप में बनवाया था।

  7. श्रीनाथजी मंदिर

    इतिहास और किंवदंती

    गैब सागर झील के तट पर बना श्रीनाथजी मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है और शहर के सबसे पवित्र ठिकानों में गिना जाता है। इसका निर्माण महारावल पुंजराज ने करवाया माना जाता है, और कहा जाता है कि यह 1623 ईस्वी में बना था। लोककथा कहती है कि औरंगज़ेब के दौर में जब मूर्तियाँ तोड़ी जा रही थीं, तब मथुरा-वृंदावन से निकाली गई श्रीनाथजी की मूल प्रतिमा को सुरक्षित ठिकाने तक पहुँचाने के रास्ते में कुछ समय गुप्त रूप से यहीं रखा गया था। वह प्रतिमा आगे चलकर नाथद्वारा पहुँची, और इसी कथा के कारण वैष्णव भक्तों में इस मंदिर का दर्जा बहुत ऊँचा है।

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