
हर मोड़ की कहानी
धौलपुर
धौलपुर को 'रेड डायमंड सिटी' यानी लाल पत्थरों की भूमि कहा जाता है। चंबल नदी, उसके उजाड़ बीहड़ और यहाँ निकलने वाला खास लाल बलुआ पत्थर इस शहर को दुनिया भर में पहचान दिलाते हैं। ऐतिहासिक इमारतों के साथ-साथ यह शहर पौराणिक कथाओं के लिए भी जाना जाता है — किले, घंटाघर, मकबरे, शाही शिकारगाह और तीर्थ सरोवर, हर जगह के पीछे अपनी एक कहानी है।
कहानियाँ
5 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
मचकुंड सरोवर
किंवदंतीपौराणिक कथा कहती है कि सूर्यवंश के चौबीसवें राजा मुचुकुंद, जो भगवान राम के पूर्वज माने जाते हैं, देवासुर संग्राम में देवताओं की ओर से लड़े। कहा जाता है कि थके हुए राजा यहीं एक गुफा में सो गए, और देवताओं ने वरदान दिया कि जो उनकी नींद तोड़ेगा वह भस्म हो जाएगा। बाद में कालयवन को रणभूमि से दूर ले जाकर भगवान कृष्ण — इसी से, कहते हैं, उनका नाम 'रणछोड़' पड़ा — इसी गुफा में आ छिपे और अपना पीतांबर सोए राजा पर डाल दिया। कालयवन ने उन्हें कृष्ण समझकर लात मारी और राजा की आँख खुलते ही जलकर राख हो गया। तभी से पूजनीय यह सरोवर 'तीर्थों का भांजा' कहलाता है।
शेरगढ़ किला
इतिहासचंबल नदी के किनारे खड़ा शेरगढ़ किला धौलपुर के सबसे जाने-पहचाने पुराने खंडहरों में है। कहा जाता है कि इसे सबसे पहले मालदेव ने बनवाया था — कुछ विवरण उन्हें धौलपुर का राजा बताते हैं, तो कुछ जोधपुर का शासक। किले का नाम शेरशाह सूरी से जुड़ा है, जो 1540 ई. में दिल्ली के सुल्तान बने; किले की मरम्मत करवाने, उसे मजबूत करने और अपने नाम पर 'शेरगढ़' नाम देने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। कहते हैं कि इन दीवारों से मालवा और दक्षिण भारत की ओर जाने वाले रास्तों पर नजर रखी जा सकती थी। आज यह खामोश खंडहर बीहड़ों पर पहरा देता खड़ा है।
निहाल टावर (घंटाघर)
इतिहासधौलपुर शहर के ठीक बीचोबीच खड़ा निहाल टावर यहाँ का सबसे जाना-पहचाना घंटाघर है। कहा जाता है कि यह मीनार करीब 150 फीट ऊँची है और इसे राजस्थान के सबसे ऊँचे घंटाघरों में गिना जाता है। परंपरा के अनुसार इसकी नींव 1880 के दशक में महाराजा निहाल सिंह के समय रखी गई थी, जिनके नाम पर इसका नाम पड़ा, और निर्माण इतना लंबा खिंचता चला गया कि इसे पूरा करवाया महाराजा उदयभान सिंह ने। बनावट में ब्रिटिश और राजस्थानी कारीगरी का बेहतरीन मेल दिखता है, और आज भी शहर की भीड़भाड़ के बीच यही मीनार सबसे बड़ी पहचान है।
गजरा का मकबरा
इतिहास और किंवदंतीधौलपुर के महाराजा भगवंत सिंह ने अपनी बेहद चहेती गजरा के लिए यह मकबरा बनवाया था, जिन्हें परंपरा उनकी पासवान के रूप में याद करती है। स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि इसे आगरा के ताजमहल की तर्ज पर, दो कब्रों के साथ गढ़ने की योजना थी। कारीगरी शुरू भी हुई और नक्काशी का सौंदर्य आज भी साफ दिखता है, लेकिन इमारत कभी पूरी नहीं हो पाई। यही अधूरापन इसकी पहचान बन गया — लोग इसे 'अधूरा ताजमहल' या 'धौलपुर का ताजमहल' कहते हैं। मोहब्बत की यह अधूरी निशानी शहर की सबसे भावुक कहानियों में गिनी जाती है।
तालाब-ए-शाही और खानपुर महल
इतिहासधौलपुर से कुछ दूर फैली तालाब-ए-शाही झील और उसके किनारे खड़ा खानपुर महल मुगलों के शौक की निशानी हैं। कहा जाता है कि यह शिकारगाह लगभग 1617 ईस्वी में शहजादे खुर्रम के लिए बनवाई गई थी, जो आगे चलकर सम्राट शाहजहाँ कहलाए। परंपरा के अनुसार धौलपुर के घने जंगलों में शिकार उन्हें बेहद प्रिय था, इसलिए उनके ठहरने के लिए यह शाही आरामगाह तैयार करवाई गई। आज भी झील का ठहरा हुआ पानी और महल की मेहराबें मिलकर उस दौर का नक्शा आँखों के सामने खींच देती हैं, जब बादशाह शिकार पर निकलते और रातें यहीं बिताते थे।
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