
हर मोड़ की कहानी
चूरू
राजस्थान के शेखावाटी अंचल में बसा चूरू 'थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार' कहलाता है। नक्काशीदार हवेलियाँ, रेत के टीले और पुरानी वास्तुकला इस शहर की पहचान हैं, मगर इसकी असली दौलत इसके किस्से हैं। यहाँ का हर किला, तालाब और मंदिर वीरता, त्याग और भक्ति की कोई न कोई कहानी अपने भीतर सँजोए बैठा है, जो सुनने वाले को सदियों पीछे ले जाती है।
कहानियाँ
5 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
चूरू का किला
इतिहास और किंवदंतीचूरू का किला उस अनोखे किस्से के लिए याद किया जाता है जिसमें दुश्मन पर चांदी के गोले बरसाए गए थे। इसे ठाकुर कुशल सिंह ने बनवाया था, पर निर्माण का साल विवादित है; 1739 उनमें से एक है। सन 1814 में बीकानेर की फ़ौज ने किले को घेर लिया और ठाकुर शिव सिंह अपनी सेना के साथ डटे रहे। कहते हैं कि तोप के गोले ढालने का लोहा खत्म हो गया। तब शहर के सुनारों, सेठों और आम लोगों ने अपने घरों के सोने-चांदी के गहने लाकर राजा के सामने रख दिए। लोहारों ने चांदी के गोले ढाले, और कहा जाता है कि प्रजा की यह निष्ठा देखकर घेरा उठा लिया गया।
सेठानी का जोहड़
इतिहासचूरू से कुछ ही किलोमीटर दूर — दूरी को लेकर स्रोत अलग-अलग बात कहते हैं — बना सेठानी का जोहड़ एक शांत और बेहद खूबसूरत पुराना जलाशय है। सन 1899-1900 में, जिसे विक्रम संवत 1956 के कारण छपनिया अकाल कहा जाता है, पूरे इलाके में अन्न और पानी का भयंकर संकट खड़ा हो गया था। आदमी और मवेशी दोनों दम तोड़ रहे थे। उसी समय चूरू के नामी सेठ भगवान दास बागला की विधवा पत्नी ने यह विशाल जोहड़ खुदवाया, ताकि लोगों को मजदूरी भी मिले और पानी की किल्लत हमेशा के लिए दूर हो जाए। कहा जाता है कि हज़ारों परिवारों ने इसी काम के सहारे अकाल के दिन काटे। आज यहाँ छतरियाँ और प्रवासी पक्षी दोनों मन मोह लेते हैं।
सुराना हवेली
इतिहासचूरू को हवेलियों का शहर यूँ ही नहीं कहते, और इन सबमें सुराना हवेली सबसे निराली है। छह मंज़िला यह इमारत ओसवाल जैन सुराना परिवार के व्यापारियों ने खड़ी करवाई थी — कहा जाता है कि लगभग सन 1870 में। इसकी सबसे बड़ी पहचान है वह गिनती जो गढ़ी हुई लगती है: बताया जाता है कि इसमें 1111 खिड़कियाँ और दरवाज़े हैं। कहते हैं, इतनी झरोखेदार बनावट कोई शौक भर नहीं थी — मक़सद यह था कि रेगिस्तान की तपती गर्मी में भी हवा हर कोने तक पहुँचे और पूरी हवेली ठंडी बनी रहे। इसकी दीवारों पर ढोला-मारू जैसी पुरानी राजस्थानी प्रेम कथाओं के भित्ति चित्र बने हैं, जिनके रंग आज भी बोलते हैं।
सालासर बालाजी धाम
इतिहास और किंवदंतीचूरू ज़िले के सालासर कस्बे का बालाजी धाम देश के सबसे प्रतिष्ठित हनुमान मंदिरों में गिना जाता है, और यहाँ विराजी मूर्ति अपने आप में अनोखी है। कहा जाता है कि लगभग सन 1754 में आसोटा गाँव में एक किसान खेत जोत रहा था कि उसका हल किसी कड़ी चीज़ से टकरा गया। मिट्टी हटाई गई तो हनुमान जी की मूर्ति निकली — दाढ़ी और मूँछों वाली, जिसके बारे में भक्तों की मान्यता है कि ऐसी प्रतिमा देश में और कहीं नहीं। कहते हैं कि उसी रात परम भक्त मोहनदास जी को स्वप्न में इसे सालासर में स्थापित करने का संकेत मिला, और वहीं यह विशाल धाम बसा।
ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य
इतिहास और किंवदंतीताल छापर थार के बीचोंबीच फैला हरा-भरा घास का मैदान है, जहाँ काले हिरण झुंड बनाकर दौड़ते दिखते हैं और सर्दियों में कुरजाँ पक्षी डेरा डालते हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में यह इलाका पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर द्रोणपुर कहलाता था। बाद के दिनों में यह बीकानेर के महाराजाओं का निजी शिकारगाह रहा। फिर सोच बदली, वन्यजीवों के संरक्षण की अहमियत समझी गई और इस मैदान को पूरी तरह सुरक्षित अभयारण्य घोषित कर दिया गया। आज रेत के इस विस्तार में यह जगह जीव-जंतुओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं।
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