
हर मोड़ की कहानी
राजसमंद
अरावली की गोद में बसा राजसमंद जिला मेवाड़ के शौर्य, गौरवशाली इतिहास और शांत झीलों के लिए जाना जाता है। जिले को यह नाम यहीं की मशहूर राजसमंद झील से मिला, जिसे महाराणा राज सिंह प्रथम ने बनवाया था। कुंभलगढ़ की अजेय दीवारों से लेकर हल्दीघाटी के रणक्षेत्र और नाथद्वारा-कांकरोली के मंदिरों तक, यहाँ का हर पड़ाव अपने साथ कोई न कोई कहानी लेकर चलता है।
कहानियाँ
6 जगहें, और हर एक पर क्या हुआ था
राजसमंद झील और नौचौकी पाल
इतिहास और किंवदंतीमहाराणा राज सिंह प्रथम ने यह झील 1662 से 1676 के बीच बनवाई — गहने के लिए नहीं, अकाल राहत के लिए: सूखे से उजड़े लोगों को इससे मज़दूरी मिली, और इसे राजस्थान का सबसे पुराना ज्ञात राहत कार्य माना जाता है। लोककथा है कि पाल बार-बार टूटती रही, और मालवा की घेवर बाई के हाथों नींव रखने पर ही वह टिकी; कहा जाता है कि किनारे आज भी उनका मंदिर है। पाल को उसकी नौ नक्काशीदार चौकियों के कारण नौचौकी कहते हैं, और 25 काले संगमरमर पत्थरों पर खुदी 'राजप्रशस्ति' भारत का सबसे बड़ा शिलालेख मानी जाती है। कभी लंदन–सिडनी मार्ग के सी-प्लेन यहाँ उतरते थे, और दूसरे विश्वयुद्ध में यह झील सहायक वायुसैनिक अड्डा बनी।
कुंभलगढ़ दुर्ग
इतिहास और किंवदंतीमेवाड़ की पहाड़ियों पर खड़ा यह दुर्ग महाराणा कुंभा ने बनवाया था और आज सिर्फ़ राजसमंद नहीं, पूरे भारत की शान है। इसकी परकोटा दीवार करीब 36 किलोमीटर लंबी है, जिसे चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार कहा जाता है — यह नाम प्यार से दिया गया है, प्रमाणित तथ्य नहीं। लोग कहते हैं कि यह इतनी चौड़ी है कि उस पर आठ घोड़े एक साथ दौड़ सकते थे। सीधे हमले बार-बार इससे टकराकर लौट गए, इसीलिए इसे अजेय दुर्ग कहा गया; फिर भी एक बार, 1578 में अकबर की छह महीने लंबी घेराबंदी के आगे यह गिरा था। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप का जन्म इन्हीं दीवारों के भीतर हुआ था।
हल्दीघाटी
इतिहास और किंवदंतीयहाँ की मिट्टी हल्दी जैसी पीली है, और उसी रंग से इस दर्रे को हल्दीघाटी नाम मिला। सन 1576 में इसी सँकरी घाटी में महाराणा प्रताप और मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबर की सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ था। सबसे ज़्यादा सुनाई जाने वाली कहानी चेतक की है — कहा जाता है कि घायल महाराणा को पीठ पर लादकर वह वफादार घोड़ा दुश्मनों के बीच से निकला, एक चौड़ा नाला लाँघा और उस पार जाकर दम तोड़ दिया। उसकी याद में यहाँ सुंदर स्मारक बना है। पास ही रक्त तलाई है, जिसे युद्ध की सबसे खूनी ज़मीन के रूप में याद किया जाता है।
श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा
इतिहास और किंवदंतीनाथद्वारा का यह मंदिर भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप श्रीनाथजी को समर्पित है और देश-विदेश के भक्तों की आस्था का केंद्र है। कथा है कि औरंगज़ेब के दौर में जब मंदिर तोड़े जा रहे थे, तब श्रीनाथजी के विग्रह को ब्रज में मथुरा के पास गोवर्धन पर्वत से बैलगाड़ी में बिठाकर सुरक्षित ठिकाने की ओर रवाना किया गया। गाड़ी जब राजसमंद के पास सिहाड़ गाँव पहुँची, तो उसका पहिया ज़मीन में ऐसा धँसा कि लाख कोशिशों पर भी आगे न बढ़ा। मान्यता है कि पुजारियों ने इसे प्रभु की इच्छा माना और वहीं मंदिर खड़ा किया — वही गाँव आज नाथद्वारा कहलाता है।
द्वारकाधीश मंदिर, कांकरोली
इतिहासराजसमंद झील के किनारे कांकरोली में बसा यह मंदिर पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय का एक और बड़ा केंद्र है। कहा जाता है कि श्रीनाथजी की तरह द्वारकाधीश जी की प्रतिमा भी मुगल आक्रमणों से बचाने के लिए मथुरा क्षेत्र से यहाँ लाई गई थी। प्रतिमा को लाकर विराजमान करने वाले वल्लभाचार्य जी के वंशज थे, और महाराणा राज सिंह ने, जिनकी झील उस समय बन ही रही थी, उन्हें भूमि और आश्रय दिया; अधिकांश विवरणों के अनुसार मंदिर अपने वर्तमान स्थान पर झील पूरी होने के बाद ही आया। दर्शन के समय घंटियों की आवाज़, भक्तों की भीड़ और घाटों के पार फैला झील का पानी मिलकर एक अलग ही शांति रच देते हैं।
पिपलांत्री गाँव
इतिहासपारंपरिक किलों और महलों से हटकर, राजसमंद का यह छोटा-सा गाँव दुनिया भर में अपनी एक अनोखी रीत के लिए जाना जाता है। यहाँ जब भी किसी घर में बेटी जन्म लेती है, तो गाँव के लोग मिलकर 111 पौधे लगाते हैं — यह परंपरा बरसों से निभाई जा रही है। बेटी बचाओ की सोच और पर्यावरण की चिंता, दोनों इस एक रीत में गुँथ गई हैं। अब तक यहाँ लाखों पेड़ लग चुके हैं, जिन्होंने इस पूरे इलाके की सूरत ही बदल दी है, और यही वजह है कि लोग दूर-दूर से यह मिसाल देखने आते हैं।
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